जुम्मन और शकील बहुत अच्छे दोस्त थे। साथ पढ़े, साथ खेले और साथ बड़े भी हुए। किस्मत से दोनों को एक ही ऑफ़िस में नौकरी भी मिली और ज़िंदगी मज़े में गुज़रने लगी... दोनों का अक्सर एक-दूसरे के घर आना-जाना लगा रहता।
जुम्मन जब भी कभी शकील के पास जाता, शकील बड़े शान से अपना सीना फुला कर घरवालों से अपने दोस्त की तारीफ़ करता। शकील अक्सर इमोशनल होकर अपने बीवी-बच्चों से कहता, "अगर मैं कभी मर भी जाऊं तो फ़िक्र मत करना। मेरे पीछे मेरा भाई जुम्मन तुम सबका ख़्याल रखेगा। मेरे जाने के बाद अगर तुम्हें कभी किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो, तो बेझिझक जुम्मन से कहना।" जुम्मन भी अपने दोस्त की बातों पर हामी भरता, लेकिन उसका साथ छूटने का डर उसे अंदर से हिला देता।
पर एक रोज़ वही हुआ, जो बात शकील अक्सर मज़ाक में कहता था। महज़ एक दिन की बीमारी के बाद उसकी जान चली गई। मोहल्ले में मातम पसर गया।
शकील के जाने की ख़बर जुम्मन पर बिजली बन कर गिरी। वो रोता-पिटता अपने दोस्त के घर पहुंचा। ड्राइंग रूम में शकील की लाश पड़ी थी। घर में कोहराम मचा था। उसकी बीवी सायरा हर दोस्त या रिश्तेदार को देखते ही बेहोश हो जाती।
जुम्मन ने सायरा का हाल पूछा और अचानक उसे न जाने क्या सूझी, अपने कुर्ते से पांच सौ रुपए का एक नोट निकाल कर उसने सायरा के हवाले कर दिया। कहा, "हिम्मत से काम लो, सब ठीक हो जाएगा।" अब सायरा अपने शौहर के सबसे अच्छे दोस्त के टुच्चेपन से हैरान थी...
Thursday, 22 January 2009
Saturday, 17 January 2009
...दबे पांव आई एक ख़ुशी!

ज़िंदगी में कई बार ख़ुशी और ग़म कब और कैसे दबे पांव दस्तक देते हैं, पता भी नहीं चलता। ऐसा मेरे साथ अक्सर होता है। आपके साथ भी होता होगा। आज बात ऐसी ही एक छोटी सी ख़ुशी की, जिसे मिले हुए वैसे तो चौबीस घंटे गुज़र चुके हैं, लेकिन उसके बारे में जितनी बार सोचता हूं मन एक अजीब उमंग और भावुकता से भर उठता है।
मैं एक मध्यमवर्गीय परिवार से हूं। मेरे पिता सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुके हैं। उनकी ईमानदारी और हालात का तकाज़ा कुछ ऐसा रहा कि सालों की लंबी नौकरी के बावजूद एक ऐसी छत का इंतज़ाम नहीं हो सका, जिसे वे अपना कह सकें। किराएदार के तौर पर मां-पिताजी की ज़िंदगी का एक लंबा वक़्त गुज़र गया। उन्हें इसका मलाल भी है, लेकिन हमारे सामने उन्होंने इसे कभी ज़ाहिर नहीं किया। जब हम दो भाइयों ने होश संभाला तो दूसरे तमाम नौजवानों की तरह हमारे मन में भी कुछ कर गुज़रने की इच्छा थी। हालात ने साथ दिया और मां-पिताजी के आशीर्वाद से आख़िरकार हमने अब एक मकान ख़रीद लिया है। अच्छी लोकैलिटी में एक शानदार फ्लैट। मैं रहता तो दिल्ली में हूं लेकिन घर के सभी लोग अब इस नए मकान में शिफ्ट हो चुके हैं। इस मकान के साथ ही सालों से सभी के दिलों में दबी एक ऐसी ख्वाहिश पूरी हो चुकी है, जिसके बारे में कुछ साल पहले तक सोचना भी हमारे लिए मुश्किल था।
बहरहाल, नई ख़ुशी ये है कि कल दोपहर को मां ने अचानक मुझे फ़ोन किया। बोली, "बेटा तेरे पिताजी और मैं घर के बरामदे में बैठी लंच कर रही हूं। ठंडी हवा चल रही है और गुनगुनी धूप खिली है। अपने घर में यूं इत्मीनान से बैठना कितना सुकून दे रहा है, ये मैं बता नहीं सकती। फ़ोन बस ये कहने के लिए किया था कि बेटा, और तरक्की करो। जीते रहो।" यकीन मानिए, मां के ये चंद अल्फ़ाज़ अब भी मेरे कानों में गूंज रहे हैं। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं है।
Monday, 12 January 2009
राजा पीटर का एक और चेहरा!

ये बात कोई दस साल पुरानी है। उन दिनों मैं अपने गृह नगर जमशेदपुर में था और झारखंड के लीडिंग न्यूज़पेपर 'प्रभात ख़बर' में काम करता था। तब क्राइम रिपोर्टर नहीं था, लेकिन ख़बरों के सिलसिले में मेरा अक्सर कोर्ट में जाना लगा रहता था। उस रोज़ दोपहर को भी जब मैं कोर्ट परिसर में पहुंचा, तो एक पत्रकार साथी से मुलाक़ात हो गई। हाल-चाल पूछने के बाद उसने कहा, 'यार, राजा तुम्हें खोज रहा है...।' ये बात सुनते ही मैं चौंक गया। दरअसल, एक खूंखार क्रिमिनल के तौर पर मैंने राजा पीटर का नाम दर्जनों बार अख़बारों में पढ़ा था, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर तब तक मेरी उससे कोई मुलाक़ात नहीं थी। इसलिए मेरा चौंकना लाज़िमी था। मैंने अपने उस साथी से राजा के मुझे ढूंढ़ने की वजह भी पूछी, लेकिन उसने कहा कि ये राजा ही बता सकता है। राजा उन दिनों जमशेदपुर जेल में बंद था और उस पर क़त्ल से लेकर अपहरण और जबरन वसूली के कई मामले दर्ज थे। कुल मिलाकर, जुर्म की दुनिया में राजा पीटर का नाम काफ़ी ऊपर था।
ख़ैर, अपने दोस्त की बात सुनकर मैं कोर्ट परिसर में बने हाजत (वो जगह जहां सुनवाई के लिए लाए गए क़ैदियों को रखा जाता है) के पास जा पहुंचा। मुझे देखते ही कैदियों की भीड़ से आवाज़ आई और अगले ही पल मैं राजा पीटर से मुख़ातिब था। दुबला-पतला और दरम्याने कद का एक ऐसा नौजवान, जिसे देख कर किसी के लिए भी उसके खूंखार क्रिमिनल होने पर यकीन करना मुश्किल हो जाए।
बहरहाल, मैंने उससे मुझे ढूंढ़ने की वजह पूछी तो बिना कुछ कहे सलाखों के पीछे से राजा ने कुछ रुपए मेरी ओर बढ़ा दिए। मैं हैरान!!! अब इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, उसने मुझे अख़बार में छपी मेरी एक ख़बर का हवाला दिया और ये रुपए उस शख्स तक पहुंचा देने की गुज़ारिश की, जिसके बारे में ख़बर छपी थी। दरअसल, उस रोज़ मैंने 'प्रभात ख़बर' में एक ऐसे परिवार के बारे में स्टोरी लिखी थी, जो ग़रीबी और बीमारी के चक्रव्यूह में फंस कर तबाह हो चला था। बीवी की झुलस कर मौत हो चुकी थी और कैंसर का शिकार शौहर सरकारी अस्पताल में पड़ा मौत का इंतज़ार कर रहा था। बच्चे बाप के जीते-जी यतीम हो गए थे।
अब राजा एक सांस में कह गया, 'जेल में बंद सभी कैदियों ने आपकी ख़बर पढ़ी और सबको बड़ा अफ़सोस हुआ। हम कैदियों ने जेल में ही इस परिवार की मदद का फ़ैसला किया और आपस में चंदा कर ये 25 सौ रुपए इकट्ठा किए हैं। ये रुपए आप उस आदमी तक पहुंचा दीजिए...' राजा पीटर के मुंह से ये बातें सुन कर मैं अवाक रह गया! उससे मुझे ऐसे किसी बात की कोई उम्मीद नहीं थी। तब तक दूसरे तमाम लोगों की तरह मैं भी किसी क्रिमिनल बैकग्राउंड के इंसान को सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ज़ालिम और पत्थर दिल इंसान के तौर पर ही देखता था। लेकिन राजा की इस कोशिश ने मेरा नज़रिया बदल दिया।
बहरहाल, इसके बाद पिछले दस सालों में मेरी राजा से शायद दस बार भी बात नहीं हुई होगी। लेकिन ना तो राजा मुझे भूल सका था और ना मैं राजा को। तमाड़ विधान सभा उप चुनाव में झारखंड के दिशोम गुरु शिबू सोरेन को पटखनी देने के बाद जब मैंने जीत की खुशी में झूमते राजा को दिल्ली से फ़ोन किया, तो एक बार फिर से उसने मुझे चौंका दिया। मुबारकबाद लेने के बाद उसने एक बार फिर से उस वाकये का ज़िक्र छेड़ दिया, जो दस साल पहले गुज़रा था... फ़ोन रखने के बाद मैं सोचने लगा कि शायद यही वजह है राजा पीटर आज झारखंड का नया 'राजा' है...
Wednesday, 7 January 2009
...पर 'हिंदुस्तानी क़साबों' का क्या होगा?
जब से मुंबई हमले में पाकिस्तान का हाथ होने की बात सामने आई है, पाकिस्तान को कोसने का सिलसिला शुरू हो गया है। कोसना बनता भी है। पाकिस्तान सालों से गलथेथरई कर रहा है। लिहाज़ा, क़साब के पकड़े जाने के बाद इस बार सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को बेनक़ाब करने की कोशिश में लग गई है। लेकिन इस कोशिश के बीच एक सवाल ऐसा है, जो अक्सर मुझे परेशान करता है... वो ये कि एक मुल्क के तौर पर तो हम शायद पाकिस्तान और वहां से प्रायोजित होनेवाले आतंकवाद से निपट भी लें, लेकिन हिंदुस्तान में पलनेवाले उन 'पाकिस्तानियों' का क्या होगा, जो लगातार उसी थाली में छेद कर रहे हैं, जिसमें ख़ाते हैं।
मुंबई हमले में पाकिस्तान का हाथ अब ज़माने के सामने साबित हो चुका है। लेकिन हाल के दिनों में हिंदुस्तान के सीने पर ऐसे दसियों हमले हुए हैं, जिन्हें अंजाम देनेवाले कोई विदेशी नहीं, बल्कि इसी हिंदुस्तान की मिट्टी में पले-बढ़े लोग हैं। फिर चाहे वो हमले जयपुर के हों, बेंगलुरू के, गुवाहाटी के, मालेगांव के, हैदराबाद के, अहमदाबाद के या फिर राजधानी दिल्ली के। तक़रीबन सभी हमलों और धमाकों में हिंदुस्तानियों के शामिल होने की बात सामने आई है। अफ़जल, दाऊद, टाइगर, हाकिम, सैफ़, बशर, ज़ीशान जैसे क़साबों की हमारे पास कोई कमी नहीं है।
संसद पर हमला करने के मुख्य आरोपी अफ़ज़ल गुरू को हम अब भी फांसी के फंदे तक नहीं पहुंचा सके हैं। ऊपर से ऐसे 'मीर ज़ाफ़रों' और 'जयचंदों' की वकालत करनेवाले भी हमारे यहां मौजूद हैं। कई संगठन जहां शुरू से ही अफ़ज़ल गुरू की सज़ा का विरोध कर रहे हैं, वहीं अरुंधति राय और प्रफुल्ल बिदवई सरीखे लोग तो अफ़ज़ल को लेकर न्यायालय के रुख पर ही सवाल खड़ा कर चुके हैं। इनका कहना है कि अफ़ज़ल के मामले में तो सरकार ने इंसान को हासिल कुदरती इंसाफ़ की भी अनदेखी कर दी। दिल्ली धमाकों के आरोपियों के साथ पुलिस के एनकाउंटर के बाद शुरू हुई सियासत की तपिश अब भी कम नहीं हुई है। ऐसे में सिर्फ़ एक क़साब को पकड़ कर पाकिस्तान से निपटने से पहले हमें बहुत कुछ सोचने की ज़रूरत है।
मुंबई हमले में पाकिस्तान का हाथ अब ज़माने के सामने साबित हो चुका है। लेकिन हाल के दिनों में हिंदुस्तान के सीने पर ऐसे दसियों हमले हुए हैं, जिन्हें अंजाम देनेवाले कोई विदेशी नहीं, बल्कि इसी हिंदुस्तान की मिट्टी में पले-बढ़े लोग हैं। फिर चाहे वो हमले जयपुर के हों, बेंगलुरू के, गुवाहाटी के, मालेगांव के, हैदराबाद के, अहमदाबाद के या फिर राजधानी दिल्ली के। तक़रीबन सभी हमलों और धमाकों में हिंदुस्तानियों के शामिल होने की बात सामने आई है। अफ़जल, दाऊद, टाइगर, हाकिम, सैफ़, बशर, ज़ीशान जैसे क़साबों की हमारे पास कोई कमी नहीं है।
संसद पर हमला करने के मुख्य आरोपी अफ़ज़ल गुरू को हम अब भी फांसी के फंदे तक नहीं पहुंचा सके हैं। ऊपर से ऐसे 'मीर ज़ाफ़रों' और 'जयचंदों' की वकालत करनेवाले भी हमारे यहां मौजूद हैं। कई संगठन जहां शुरू से ही अफ़ज़ल गुरू की सज़ा का विरोध कर रहे हैं, वहीं अरुंधति राय और प्रफुल्ल बिदवई सरीखे लोग तो अफ़ज़ल को लेकर न्यायालय के रुख पर ही सवाल खड़ा कर चुके हैं। इनका कहना है कि अफ़ज़ल के मामले में तो सरकार ने इंसान को हासिल कुदरती इंसाफ़ की भी अनदेखी कर दी। दिल्ली धमाकों के आरोपियों के साथ पुलिस के एनकाउंटर के बाद शुरू हुई सियासत की तपिश अब भी कम नहीं हुई है। ऐसे में सिर्फ़ एक क़साब को पकड़ कर पाकिस्तान से निपटने से पहले हमें बहुत कुछ सोचने की ज़रूरत है।
Monday, 15 December 2008
एक बार ग़लतफ़हमी में भी पिट गया!
मेरे एक दोस्त ने कुछ रोज़ पहले मुझे एक फ़ोन किया। मेरे हैलो कहते ही वो शुरू हो गया। एक सांस में कह गया, "यार! आज हमारे मोहल्ले में एक बड़ी बात हो गई... मेरे घर के ठीक सामने एक लड़के को उस बाप ने सरेआम दो चांटे रसीद डाले। लड़का काफ़ी देर से गली में मोटरसाइकिल पर स्टंट दिखा रहा था। और उसके बाप को ग़ुस्सा आ गया।"
मैंने पूछा, "इसमें बड़ी बात क्या है?"
तो उसने कहा, "क्या बात करते हो, तुमने सुना नहीं! उसके फ़ादर ने उसे सरेआम दो थप्पड़ मारे।"
'बड़ी बात' तो मेरे समझ में नहीं आई, लेकिन मुझे अपना बचपन ज़रूर याद आ गया... वो बचपन, जिसमें ना तो हमारी शैतानियों का कोई हिसाब था और ना ही पिटने-पिटाने का... कई बार तो गलतफ़हमी में ही पीट दिए जाते थे और बात आई-गई हो जाती थी... आज मेरे दोस्त के बहाने एक किस्सा मेरे बचपन के दिनों का...
तभी मेरी उम्र कोई छह-सात साल रही होगी। शाम को अपने दोस्तों के साथ गली में खेल रहा था... खेल क्या था, किसी भी नई चीज़ को देख कर उसे अपना बताने की होड़ चल रही थी... मसलन, जैसे ही कोई कार गुज़री, तो मैंने झट से कह दिया, "ये मेरी कार है।" फिर कोई बाइक सवार गुज़रा तो किसी दोस्त ने कह दिया कि ये उसकी बाइक है... बस, कुछ ऐसा ही खेल था। सीधा-साधा... बिल्कुल बचपन जैसा। खेल अभी चल ही रहा था कि मोहल्ले में रहनेवाले एक अंकल वहां से गुज़रे। आंखों में मोटी काली ऐनक, गंजा सिर, सफ़ेद धोती-कुर्ता और मोटी काली मूंछों वाले वैद्यनाथ अंकल।
अंकल जैसे ही साइकिल से पास आए, मैंने चिल्ला कर कहा, "हमारा साइकिल", और खुशी के मारे उछल पड़ा। ख़ुशी इस बात की कि वैद्यनाथ अंकल के साइकिल पर इससे पहले कि किसी और दोस्त की नज़र पड़ती, मैंने उसे अपना कह दिया। बस इसी क़ामयाबी से कुछ इतना ख़ुश था, जैसे साइकिल सचमुच अपनी हो गई हो। लेकिन मेरी ये ख़ुशी तब काफ़ूर हो गई, जब गुस्से से तमतमाए अंकल अपनी साइकिल से उतर आए और मेरी कान उमेठ कर मुझसे पूछा, "बताओ तुमने कहा ये?" मैं बुरी तरह सहम गया। समझ में नहीं आया कि आख़िर मेरी गलती क्या है? फिर भी अंकल ने पूछा था, तो जवाब देना ही था। मैंने भी घबराते हुए 'हां' में सिर हिला दिया। अब अंकल आगबबूला हो गए। उनका गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा... कहा, "ठीक है। अभी दफ़्तर जाकर तुम्हारे पिताजी को बताता हूं कि तुम यहां क्या कर रहे हो?" इसके बाद कुछ देर तक तो अंकल का ख़ौफ़ दिलो-दिमाग़ पर छाया रहा, लेकिन फिर बचपन की मस्ती ने सबकुछ भुला दिया।
शाम हुई और पिताजी घर लौटे। अक्सर, मिठाई लेकर आते थे। और हम भी उनके आने की ख़ुशी में मचलने लगते। लेकिन उस दिन पिताजी का मूड उखड़ा हुआ था। मैं जैसे ही उनके पास पहुंचा, उन्होंने मेरी ताबड़तोड़ पिटाई शुरू कर दी। पिताजी कुछ इतने ग़ुस्से में थे कि बीच-बचाव के लिए मां को आना पड़ा। किसी तरह जान बची। मां तो इस पिटाई का सबब पूछ ही रही थी कि हिम्मत जुटा कर मैंने भी पूछ लिया कि आख़िर मुझे क्यों पीटा गया? बस फिर क्या था, पिताजी एक बार फिर ग़ुस्सा हो गए। उन्होंने मां से कहा, "तुम्हें पता है, ये आजकल सड़क पर खड़े हो कर आते-जाते लोगों को गालियां बक रहे हैं!" मैं हैरान... इस बार पिताजी से तो नहीं, लेकिन रोते-रोते मैंने मां से पूछा, "मैंने कब गाली दी?" मां ने यही सवाल पिताजी की तरफ़ उछाल दिया... अबकी पिताजी ने मुझसे पूछा, "तुम बताओ, क्या आज तुमने अपने वैद्यनाथ अंकल को 'अंधरा-शक्ल' नहीं कहा था?" कुछ देर सोच कर मैंने सारी बातें याद की और कहा, "नहीं।" अब पिताजी ने पूछा, "फिर क्या कहा था? अगर तुमने गाली नहीं दी, तो फिर वैद्यानाथ ने जब तुम्हारी कान उमेठी, तो तुमने हां क्यों कहा?" मैंने उन्हें पूरी कहानी सुनाई... और ये भी बताया कि वैद्यनाथ अंकल ने तब मेरे कान पकड़ कर सिर्फ़ इतना पूछा था, "बताओ तुमने कहा ये?" अब मैंने 'हमारा साइकिल' कहा था, सो डरते-डरते हां कह दिया था। फिर मैंने अपनी सफ़ाई में 'अंधरा-शक्ल' जैसी कोई गाली जानने से भी इनकार कर दिया। सचमुच, मुझे तब तक इस गाली का पता भी नहीं था... लेकिन अब सफ़ाई देकर भी क्या होता, जो होना था हो गया। मुझे याद है, अगले दिन सुबह पिताजी के साथ-साथ वैद्यनाथ अंकल ने भी मुझे सॉरी कहा...
मैंने पूछा, "इसमें बड़ी बात क्या है?"
तो उसने कहा, "क्या बात करते हो, तुमने सुना नहीं! उसके फ़ादर ने उसे सरेआम दो थप्पड़ मारे।"
'बड़ी बात' तो मेरे समझ में नहीं आई, लेकिन मुझे अपना बचपन ज़रूर याद आ गया... वो बचपन, जिसमें ना तो हमारी शैतानियों का कोई हिसाब था और ना ही पिटने-पिटाने का... कई बार तो गलतफ़हमी में ही पीट दिए जाते थे और बात आई-गई हो जाती थी... आज मेरे दोस्त के बहाने एक किस्सा मेरे बचपन के दिनों का...
तभी मेरी उम्र कोई छह-सात साल रही होगी। शाम को अपने दोस्तों के साथ गली में खेल रहा था... खेल क्या था, किसी भी नई चीज़ को देख कर उसे अपना बताने की होड़ चल रही थी... मसलन, जैसे ही कोई कार गुज़री, तो मैंने झट से कह दिया, "ये मेरी कार है।" फिर कोई बाइक सवार गुज़रा तो किसी दोस्त ने कह दिया कि ये उसकी बाइक है... बस, कुछ ऐसा ही खेल था। सीधा-साधा... बिल्कुल बचपन जैसा। खेल अभी चल ही रहा था कि मोहल्ले में रहनेवाले एक अंकल वहां से गुज़रे। आंखों में मोटी काली ऐनक, गंजा सिर, सफ़ेद धोती-कुर्ता और मोटी काली मूंछों वाले वैद्यनाथ अंकल।
अंकल जैसे ही साइकिल से पास आए, मैंने चिल्ला कर कहा, "हमारा साइकिल", और खुशी के मारे उछल पड़ा। ख़ुशी इस बात की कि वैद्यनाथ अंकल के साइकिल पर इससे पहले कि किसी और दोस्त की नज़र पड़ती, मैंने उसे अपना कह दिया। बस इसी क़ामयाबी से कुछ इतना ख़ुश था, जैसे साइकिल सचमुच अपनी हो गई हो। लेकिन मेरी ये ख़ुशी तब काफ़ूर हो गई, जब गुस्से से तमतमाए अंकल अपनी साइकिल से उतर आए और मेरी कान उमेठ कर मुझसे पूछा, "बताओ तुमने कहा ये?" मैं बुरी तरह सहम गया। समझ में नहीं आया कि आख़िर मेरी गलती क्या है? फिर भी अंकल ने पूछा था, तो जवाब देना ही था। मैंने भी घबराते हुए 'हां' में सिर हिला दिया। अब अंकल आगबबूला हो गए। उनका गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा... कहा, "ठीक है। अभी दफ़्तर जाकर तुम्हारे पिताजी को बताता हूं कि तुम यहां क्या कर रहे हो?" इसके बाद कुछ देर तक तो अंकल का ख़ौफ़ दिलो-दिमाग़ पर छाया रहा, लेकिन फिर बचपन की मस्ती ने सबकुछ भुला दिया।
शाम हुई और पिताजी घर लौटे। अक्सर, मिठाई लेकर आते थे। और हम भी उनके आने की ख़ुशी में मचलने लगते। लेकिन उस दिन पिताजी का मूड उखड़ा हुआ था। मैं जैसे ही उनके पास पहुंचा, उन्होंने मेरी ताबड़तोड़ पिटाई शुरू कर दी। पिताजी कुछ इतने ग़ुस्से में थे कि बीच-बचाव के लिए मां को आना पड़ा। किसी तरह जान बची। मां तो इस पिटाई का सबब पूछ ही रही थी कि हिम्मत जुटा कर मैंने भी पूछ लिया कि आख़िर मुझे क्यों पीटा गया? बस फिर क्या था, पिताजी एक बार फिर ग़ुस्सा हो गए। उन्होंने मां से कहा, "तुम्हें पता है, ये आजकल सड़क पर खड़े हो कर आते-जाते लोगों को गालियां बक रहे हैं!" मैं हैरान... इस बार पिताजी से तो नहीं, लेकिन रोते-रोते मैंने मां से पूछा, "मैंने कब गाली दी?" मां ने यही सवाल पिताजी की तरफ़ उछाल दिया... अबकी पिताजी ने मुझसे पूछा, "तुम बताओ, क्या आज तुमने अपने वैद्यनाथ अंकल को 'अंधरा-शक्ल' नहीं कहा था?" कुछ देर सोच कर मैंने सारी बातें याद की और कहा, "नहीं।" अब पिताजी ने पूछा, "फिर क्या कहा था? अगर तुमने गाली नहीं दी, तो फिर वैद्यानाथ ने जब तुम्हारी कान उमेठी, तो तुमने हां क्यों कहा?" मैंने उन्हें पूरी कहानी सुनाई... और ये भी बताया कि वैद्यनाथ अंकल ने तब मेरे कान पकड़ कर सिर्फ़ इतना पूछा था, "बताओ तुमने कहा ये?" अब मैंने 'हमारा साइकिल' कहा था, सो डरते-डरते हां कह दिया था। फिर मैंने अपनी सफ़ाई में 'अंधरा-शक्ल' जैसी कोई गाली जानने से भी इनकार कर दिया। सचमुच, मुझे तब तक इस गाली का पता भी नहीं था... लेकिन अब सफ़ाई देकर भी क्या होता, जो होना था हो गया। मुझे याद है, अगले दिन सुबह पिताजी के साथ-साथ वैद्यनाथ अंकल ने भी मुझे सॉरी कहा...
Tuesday, 9 December 2008
दूसरों की निंदा करने का मंच बनते ब्लॉग!
पिछले 8 नवंबर को मैंने एक पोस्ट लिखा था -- "आप ब्लॉग क्यों लिखते हैं?" इस पोस्ट के ज़रिए मैं लोगों से ब्लॉग लिखने की सही-सही वजह जानना चाहता था। पोस्ट के बाद कुछ लोगों को मैंने अपनी ही तरह ब्लॉग लिखने की वजह ढूंढ़ता हुआ पाया, तो किसी को अपनी रचनात्मकता को आकार देने के लिए लिखता हुआ। लेकिन ब्लॉग की दुनिया को नज़दीक से देखने और समझने के बाद एक बात का पता ज़रूर चल गया। वो ये कि हम में से ज़्यादातर लोग सिर्फ़ और सिर्फ़ दूसरों की निंदा करने और उन्हें नीचा दिखाने के लिए ही ब्लॉग लिखते हैं। आपको मेरा ये नज़रिया अजीब लग सकता है, लेकिन मुझे यकीन है कि आप दिल से मेरी इस बात रो झूठला नहीं सकेंगे।
सौ में से अस्सी ब्लॉग तो सिर्फ़ मीन-मेख निकालने के लिए चल रहे हैं। कोई लोकतंत्र की खाल खींच रहा है, तो कोई मीडिया की खाल में भूसा भर रहा है, कोई साथी ब्लॉगिए को गरिया रहा है, तो कोई अपने ही बिरादरी को लानत भेज कर 'प्रगतिशील' बनने की कोशिश कर रहा है। कुल मिलाकर, माहौल बड़ा निराशाजनक है। अभी कल की बात ही ले लीजिए... मैंने एक ब्लॉग में किसी साथी को आतंकवाद के खिलाफ़ अभियान छेड़ने पर मीडिया की खिंचाई करते हुए पाया। गरज ये थी कि मीडिया आतंकवाद पर एसएमएस मांग कर लाखों रुपए के वारे-न्यारे कर रहा है। मोबाइल कंपनियों के हाथों की कठपुतली बन गया है। इन जनाब को तो इंडिया गेट और गेटवे ऑफ इंडिया पर मोमबत्ती जला कर आतंकवाद का विरोध करने में भी शोशेबाज़ी नज़र आई।
अब सवाल ये उठता है कि रोज़ाना इश्क फ़रमाने और अपने दोस्तों को नॉनवेज जोक्स भेजने के चक्कर में एसएमएस कर लाखों रुपए पानी की तरह बहानेवाली आबादी से अगर कुछ एसएमएस राष्ट्रीयता के नाम पर मंगा लिए गए, तो इसमें कौन सा पहाड़ टूट गया? क्या ज़िंदगी में हर काम या हर हरकत को सिर्फ़ और सिर्फ़ रुपए-पैसे के नज़रिए से ही देखना ठीक है? ये सही है कि बाज़ारवाद हर किसी पर हावी है और मीडिया भी इससे अछूता नहीं है। लेकिन मीडिया पर लानत बरसानेवाले लोगों को शायद कभी भी मीडिया के सामाजिक सरोकार नज़र नहीं आते। उन्हें मीडिया में ठुमके लगाती राखी सावंत और शराब पीकर हंगामा करते राजा चौधरी तो नज़र आते हैं लेकिन आतंकवादियों के हाथों मारे गए बेगुनाहों के लिए संवेदना प्रकट करती ख़बरे नहीं दिखतीं। उन्हें जेसिका लाल और नीतिश कटारा मर्डर केस का फॉलोअप नहीं दिखता। और नज़रिए के इस कानेपन से ही छिद्रान्वेषण की शुरुआत होती है।
मीडिया के बाद ब्लॉग की दुनिया में सबसे हॉट टॉपिक आजकल आतंकवाद ही है। लेकिन ज़्यादातर ब्लॉग आतंकवाद से निबटने के तौर-तरीकों और इससे बचने पर चर्चा करने की बजाय मज़हबी नज़रिए से आतंकवाद को देखने की कोशिश में ज़्यादा नज़र आते हैं। नेताओं को गाली देने का शगल तो ख़ैर पुराना है। ईमानदारी से कहूं तो मैंने भी बारहा नेताओं को उनकी करतूतों पर लानत भेजी है, लेकिन ये भी सच है कि लानत भेजने से आगे भी सोचने की कोशिश की है।
वैसे एक सुखद सच्चाई ये भी है कि कुछ रचनाशील लोग तमाम उतार चढ़ावों के बावजूद साहित्य सेवा में डटे हैं। और इससे भी अच्छी बात ये है कि साहित्य सेवा में डटे इन ब्लॉगरों की रीडरशिप ना सिर्फ़ अच्छी है, बल्कि ऐसे पोस्ट्स पर मिलनेवाली प्रतिक्रियाएं भी उत्साह बढ़ाती हैं। उम्मीद जगाती हैं। मौजूदा राजनीति पर मेरे एक पोस्ट "नेताओं को सिर्फ़ गालियां ही देंगे या कुछ करेंगे भी!" के प्रतिक्रिया में मेरे एक साथी अनूप शुक्ल ने चुटकी ली थी कि गालियां देते रहने का मज़ा ही कुछ और है। कहीं-ना-कहीं मुझे अनूप जी की बातों में भी सच्चाई नज़र आती है। लगता है कि ब्लॉग की दुनिया से अगर निंदा और खिंचाई जैसी चीज़ों को अलग कर दिया जाए, तो शायद कुछ बचे ही नहीं। बहरहाल, सबकुछ एक हद तक हो तो ही अच्छा लगता है।
सौ में से अस्सी ब्लॉग तो सिर्फ़ मीन-मेख निकालने के लिए चल रहे हैं। कोई लोकतंत्र की खाल खींच रहा है, तो कोई मीडिया की खाल में भूसा भर रहा है, कोई साथी ब्लॉगिए को गरिया रहा है, तो कोई अपने ही बिरादरी को लानत भेज कर 'प्रगतिशील' बनने की कोशिश कर रहा है। कुल मिलाकर, माहौल बड़ा निराशाजनक है। अभी कल की बात ही ले लीजिए... मैंने एक ब्लॉग में किसी साथी को आतंकवाद के खिलाफ़ अभियान छेड़ने पर मीडिया की खिंचाई करते हुए पाया। गरज ये थी कि मीडिया आतंकवाद पर एसएमएस मांग कर लाखों रुपए के वारे-न्यारे कर रहा है। मोबाइल कंपनियों के हाथों की कठपुतली बन गया है। इन जनाब को तो इंडिया गेट और गेटवे ऑफ इंडिया पर मोमबत्ती जला कर आतंकवाद का विरोध करने में भी शोशेबाज़ी नज़र आई।
अब सवाल ये उठता है कि रोज़ाना इश्क फ़रमाने और अपने दोस्तों को नॉनवेज जोक्स भेजने के चक्कर में एसएमएस कर लाखों रुपए पानी की तरह बहानेवाली आबादी से अगर कुछ एसएमएस राष्ट्रीयता के नाम पर मंगा लिए गए, तो इसमें कौन सा पहाड़ टूट गया? क्या ज़िंदगी में हर काम या हर हरकत को सिर्फ़ और सिर्फ़ रुपए-पैसे के नज़रिए से ही देखना ठीक है? ये सही है कि बाज़ारवाद हर किसी पर हावी है और मीडिया भी इससे अछूता नहीं है। लेकिन मीडिया पर लानत बरसानेवाले लोगों को शायद कभी भी मीडिया के सामाजिक सरोकार नज़र नहीं आते। उन्हें मीडिया में ठुमके लगाती राखी सावंत और शराब पीकर हंगामा करते राजा चौधरी तो नज़र आते हैं लेकिन आतंकवादियों के हाथों मारे गए बेगुनाहों के लिए संवेदना प्रकट करती ख़बरे नहीं दिखतीं। उन्हें जेसिका लाल और नीतिश कटारा मर्डर केस का फॉलोअप नहीं दिखता। और नज़रिए के इस कानेपन से ही छिद्रान्वेषण की शुरुआत होती है।
मीडिया के बाद ब्लॉग की दुनिया में सबसे हॉट टॉपिक आजकल आतंकवाद ही है। लेकिन ज़्यादातर ब्लॉग आतंकवाद से निबटने के तौर-तरीकों और इससे बचने पर चर्चा करने की बजाय मज़हबी नज़रिए से आतंकवाद को देखने की कोशिश में ज़्यादा नज़र आते हैं। नेताओं को गाली देने का शगल तो ख़ैर पुराना है। ईमानदारी से कहूं तो मैंने भी बारहा नेताओं को उनकी करतूतों पर लानत भेजी है, लेकिन ये भी सच है कि लानत भेजने से आगे भी सोचने की कोशिश की है।
वैसे एक सुखद सच्चाई ये भी है कि कुछ रचनाशील लोग तमाम उतार चढ़ावों के बावजूद साहित्य सेवा में डटे हैं। और इससे भी अच्छी बात ये है कि साहित्य सेवा में डटे इन ब्लॉगरों की रीडरशिप ना सिर्फ़ अच्छी है, बल्कि ऐसे पोस्ट्स पर मिलनेवाली प्रतिक्रियाएं भी उत्साह बढ़ाती हैं। उम्मीद जगाती हैं। मौजूदा राजनीति पर मेरे एक पोस्ट "नेताओं को सिर्फ़ गालियां ही देंगे या कुछ करेंगे भी!" के प्रतिक्रिया में मेरे एक साथी अनूप शुक्ल ने चुटकी ली थी कि गालियां देते रहने का मज़ा ही कुछ और है। कहीं-ना-कहीं मुझे अनूप जी की बातों में भी सच्चाई नज़र आती है। लगता है कि ब्लॉग की दुनिया से अगर निंदा और खिंचाई जैसी चीज़ों को अलग कर दिया जाए, तो शायद कुछ बचे ही नहीं। बहरहाल, सबकुछ एक हद तक हो तो ही अच्छा लगता है।
Saturday, 6 December 2008
नेताओं को सिर्फ़ गालियां ही देंगे या कुछ करेंगे भी!
नेताओं को गालियों तो सबने दे दी, लेकिन नेताओं को कैसे रास्ते पर लाया जाए इसके बारे में अब तक कम ही सोचा गया। जिसने भी सोचा उसने नेताओं को समंदर में डुबोने, गोली मारने या फिर चुनाव का बहिष्कार करने तक ही सोचा। लेकिन सवाल ये है कि क्या ऐसे देश चल सकता है? आखिर क्या हो कि नेता सही रास्ते पर आ जाएं और कुर्सीमोह त्याग कर मुल्क के बारे में सोचें? पिछले कुछ दिनों से, ख़ास कर मुंबई धमाकों के बाद से, इस बारे में लगातार चर्चाओं और विमर्श के दौर से गुज़र रहा था। लेकिन इसी बीच किसी साथी ने एक ऐसी कुंजी बताई, जो हमारे पास होने के बावजूद जानकारी के अभाव में हम अक्सर उसका इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं। ये उपाय दरअसल हमारे सांवैधानिक अधिकारों का ही एक ऐसा हिस्सा है, जिसके बारे में हमारे देश के ज़्यादातर नागरिक जानते ही नहीं। अच्छे-भले, पढ़े-लिखे और माहिर भी नहीं।
कई बार आपने लोगों को ये भी कहते हुए सुना होगा कि सारे नेता और सारी पार्टियां तो एक जैसी हैं, आप किसे भी वोट दीजिए क्या फ़र्क पड़ता है! लेकिन नहीं, फ़र्क पड़वाने का तरीक़ा भी संविधान ने हमें दिया है। 'कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल 1961' की धारा 49(0) के मुताबिक अगर आप चुनाव में खड़े किसी भी उम्मीदवार को अपना वोट देने के क़ाबिल नहीं समझते हैं, तो आप 'नो-वोटिंग' के ऑप्शन पर जा सकते हैं। इसके लिए मतदान केंद्र में मौजूद प्रेज़ाइडिंग ऑफ़िसर की मदद ली जा सकती है। आपको एक ख़ास फॉर्म भरना होगा और आपका 'नो-वोट' या फिर यूं कहें कि आपका विरोध दर्ज हो जाएगा।
अब आप ये पूछ सकते हैं कि भला इससे क्या फ़र्क पड़ता है? ये तो वोट का बहिष्कार करने जैसी बात हुई। लेकिन नहीं, ये वोट के बहिष्कार से अलग है। आपको जानकर अच्छा लगेगा कि अगर किसी चुनाव क्षेत्र में हुए मतदान में सबसे ज़्यादा वोट 'नो-वोट' की कैटेगरी में डाले गए, तो प्रावधान के मुताबिक चुनाव आयोग उस चुनाव क्षेत्र की वोटिंग ही रद्द कर देगा। यानि एक बात साफ़ हो जाएगी कि अगर इलाके की जनता को चुनाव में खड़ा कोई भी प्रत्याशी अपना नुमाइंदा बनने के क़ाबिल नहीं लगता है तो चुनाव आयोग उसे आप पर थोपेगा नहीं, बल्कि उसे दौड़ से ही बाहर कर देगा। अगली बार जब भी चुनाव होगा, तब वे प्रत्याशी चुनाव में खड़े नहीं हो सकेंगे, जो उस चुनाव क्षेत्र से पिछली बार अपनी क़िस्मत आज़मा रहे थे। मतलब साफ़ है कि नो-वोटिंग का ऑप्शन चुनकर आप ना सिर्फ़ नाक़ाबिल नेताओं को सदन तक जाने से रोक सकते हैं, बल्कि पढ़े-लिखे और समझदार लोगों की ऐसी नई पौध को भी अपना नुमाइंदा बना सकते हैं, जो आमतौर पर ईमानदार होने के बावजूद राजनीतिक पार्टियों में चमचागिरी में कमज़ोर होने की वजह से पीछे छूट जाते हैं।
कई बार आपने लोगों को ये भी कहते हुए सुना होगा कि सारे नेता और सारी पार्टियां तो एक जैसी हैं, आप किसे भी वोट दीजिए क्या फ़र्क पड़ता है! लेकिन नहीं, फ़र्क पड़वाने का तरीक़ा भी संविधान ने हमें दिया है। 'कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल 1961' की धारा 49(0) के मुताबिक अगर आप चुनाव में खड़े किसी भी उम्मीदवार को अपना वोट देने के क़ाबिल नहीं समझते हैं, तो आप 'नो-वोटिंग' के ऑप्शन पर जा सकते हैं। इसके लिए मतदान केंद्र में मौजूद प्रेज़ाइडिंग ऑफ़िसर की मदद ली जा सकती है। आपको एक ख़ास फॉर्म भरना होगा और आपका 'नो-वोट' या फिर यूं कहें कि आपका विरोध दर्ज हो जाएगा।
अब आप ये पूछ सकते हैं कि भला इससे क्या फ़र्क पड़ता है? ये तो वोट का बहिष्कार करने जैसी बात हुई। लेकिन नहीं, ये वोट के बहिष्कार से अलग है। आपको जानकर अच्छा लगेगा कि अगर किसी चुनाव क्षेत्र में हुए मतदान में सबसे ज़्यादा वोट 'नो-वोट' की कैटेगरी में डाले गए, तो प्रावधान के मुताबिक चुनाव आयोग उस चुनाव क्षेत्र की वोटिंग ही रद्द कर देगा। यानि एक बात साफ़ हो जाएगी कि अगर इलाके की जनता को चुनाव में खड़ा कोई भी प्रत्याशी अपना नुमाइंदा बनने के क़ाबिल नहीं लगता है तो चुनाव आयोग उसे आप पर थोपेगा नहीं, बल्कि उसे दौड़ से ही बाहर कर देगा। अगली बार जब भी चुनाव होगा, तब वे प्रत्याशी चुनाव में खड़े नहीं हो सकेंगे, जो उस चुनाव क्षेत्र से पिछली बार अपनी क़िस्मत आज़मा रहे थे। मतलब साफ़ है कि नो-वोटिंग का ऑप्शन चुनकर आप ना सिर्फ़ नाक़ाबिल नेताओं को सदन तक जाने से रोक सकते हैं, बल्कि पढ़े-लिखे और समझदार लोगों की ऐसी नई पौध को भी अपना नुमाइंदा बना सकते हैं, जो आमतौर पर ईमानदार होने के बावजूद राजनीतिक पार्टियों में चमचागिरी में कमज़ोर होने की वजह से पीछे छूट जाते हैं।
Friday, 5 December 2008
ऐसे नेता करेंगे मुल्क की हिफ़ाज़त?
जब भी अपने देश में नेताओं की हालत देखता हूं, तो बड़ी कोफ़्त होती है। सत्ता के लिए किसी भी हद तक नीचे गिरते इन लोगों को देख कर मन खट्टा हो जाता है। हर बार ये सोचता हूं कि अब नेताओं के बारे में कुछ नहीं लिखूंगा। लेकिन हर बार ख़ुद से हार जाता हूं और नेताओं की कारगुज़ारियों पर लिखने को मजबूर हो जाता हूं। लिखना इसलिए नहीं चाहता, क्योंकि उनके बारे में कुछ लिखना चिकने घड़े पर पानी डालने जैसा लगता है और लिखने से खुद को रोक इसलिए नहीं सकता क्योंकि नेताओं की करतूत देख कर ख़ून खौलने लगता है।
ये ताज़ी पोस्ट महाराष्ट्र में चल रही मौजूदा राजनीति के मद्देनज़र है। वैसे तो महाराष्ट्र पिछले कई महीनों से गंदी राजनीति की चपेट में है, लेकिन मुंबई के आतंकी हमलों के बाद इस राजनीति ने जो शक्ल अख्तियार की है, वो पहले से भी ज़्यादा भयानक है। मुंबई में हुए हमले के बाद एकबारगी ये लग रहा था, जैसे राज ठाकरे सरीखे लोगों को अक्ल आ गई होगी और उन्होंने मिल कर जीना सीख लिया होगा। हमले के तुरंत बाद राज ठाकरे की करतूतों को याद कर-कर के जिस तरह देश भर में लोगों ने एक-दूसरे को एसएमएस भेजे, उससे एक ऐसा माहौल बनता हुआ दिख रहा था। लेकिन अब मुंबई में जो कुछ हो रहा है उसे देख कर लगने लगा है कि वहां राज ठाकरे से भी बड़े-बड़े गए-बीते पहले से ही बैठे हुए हैं।
हज़ारों लोगों की जान जाने के बाद देश के गृहमंत्री शिवराज पाटील की नैतिकता जागी और भरे मन से उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा... उनकी देखा-देखी दूसरे 'खरबूजों' ने भी रंग बदले, लेकिन महाराष्ट्र के सीएम थे कि कुर्सी छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहे थे। ये और बात है कि वे बार-बार "मैंने आलाकमान को अपना इस्तीफ़ा ऑफ़र कर दिया है," का जुमला कह-कह कर ख़ुद को सत्तामोह से इतर दिखाने की कोशिश में जुटे थे... लेकिन आखिरकार वही हुआ, जिसका डर उन्हें खाये जा रहा था। आलाकमान के इशारे पर विलासराव देशमुख को सीएम की कुर्सी छोड़नी पड़ी। कांग्रेस ने भी कुछ सोच-समझ कर नांदेड़ के विधायक अशोक चव्हान की ताजपोशी का फ़ैसला कर लिया। लेकिन अभी पार्टी का ये फ़ैसला आया ही था कि राणे ऐसे गरजे कि हर कोई सन्न रह गया। राणे ने ना सिर्फ़ अशोक चव्हान को नाक़ाबिल बताया, बल्कि इससे पहले के मुख्यमंत्री देशमुख को भी नाकारा करार दिया। वैसे तो कुर्सी के लिए नेताओं की ये तथाकथित बग़ावत कोई नई बात नहीं है, लेकिन राणे ने जिस मौके पर ये जूतमपैजार शुरू की है, उससे सबका सिर शर्म से झुक गया है।
जब देश आतंकवाद की आग में जल रहा हो, अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडोलिजा राइस समेत पूरी दुनिया के सियासतदान हिंदुस्तानी नेताओं को साथ मिल कर आतंकवाद से मुक़ाबला करने की सीख दे रहे हों, एक राष्ट्रीय संकट का माहौल हो, तब कुर्सी के लिए कांग्रेस में मची ये मारामारी सचमुच बहुत पीड़ादायक है। और राणे अपने ऊपर बाग़ी होने का टैग कुछ इस अंदाज़ में चस्पां कर रहे हैं, जैसे उन्होंने एक सड़ी हुई व्यवस्था के खिलाफ़ मुल्क और महाराष्ट्र के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया हो। ख़ुद को सीएम का दावेदार बताने में उनका जो 'कनविक्शन' दिखता है, उससे लगता है जैसे वे मराठी मानुष की सेवा करने के लिए मरे जा रहे हैं। दूसरी ओर, उन पर पलटवार करनेवाले भी कमतर नहीं हैं।
ये हालात कमोबेश हर हिंदुस्तानी के दिलो-दिमाग़ को झकझोर देता है। सवाल, बस एक ही है कि जब नेताओं का सारा ज़ोर सिर्फ़ और सिर्फ़ कुर्सी हासिल करने पर हो, वे भला मुल्क की की हिफ़ाज़त कैसे करेंगे?
ये ताज़ी पोस्ट महाराष्ट्र में चल रही मौजूदा राजनीति के मद्देनज़र है। वैसे तो महाराष्ट्र पिछले कई महीनों से गंदी राजनीति की चपेट में है, लेकिन मुंबई के आतंकी हमलों के बाद इस राजनीति ने जो शक्ल अख्तियार की है, वो पहले से भी ज़्यादा भयानक है। मुंबई में हुए हमले के बाद एकबारगी ये लग रहा था, जैसे राज ठाकरे सरीखे लोगों को अक्ल आ गई होगी और उन्होंने मिल कर जीना सीख लिया होगा। हमले के तुरंत बाद राज ठाकरे की करतूतों को याद कर-कर के जिस तरह देश भर में लोगों ने एक-दूसरे को एसएमएस भेजे, उससे एक ऐसा माहौल बनता हुआ दिख रहा था। लेकिन अब मुंबई में जो कुछ हो रहा है उसे देख कर लगने लगा है कि वहां राज ठाकरे से भी बड़े-बड़े गए-बीते पहले से ही बैठे हुए हैं।
हज़ारों लोगों की जान जाने के बाद देश के गृहमंत्री शिवराज पाटील की नैतिकता जागी और भरे मन से उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा... उनकी देखा-देखी दूसरे 'खरबूजों' ने भी रंग बदले, लेकिन महाराष्ट्र के सीएम थे कि कुर्सी छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहे थे। ये और बात है कि वे बार-बार "मैंने आलाकमान को अपना इस्तीफ़ा ऑफ़र कर दिया है," का जुमला कह-कह कर ख़ुद को सत्तामोह से इतर दिखाने की कोशिश में जुटे थे... लेकिन आखिरकार वही हुआ, जिसका डर उन्हें खाये जा रहा था। आलाकमान के इशारे पर विलासराव देशमुख को सीएम की कुर्सी छोड़नी पड़ी। कांग्रेस ने भी कुछ सोच-समझ कर नांदेड़ के विधायक अशोक चव्हान की ताजपोशी का फ़ैसला कर लिया। लेकिन अभी पार्टी का ये फ़ैसला आया ही था कि राणे ऐसे गरजे कि हर कोई सन्न रह गया। राणे ने ना सिर्फ़ अशोक चव्हान को नाक़ाबिल बताया, बल्कि इससे पहले के मुख्यमंत्री देशमुख को भी नाकारा करार दिया। वैसे तो कुर्सी के लिए नेताओं की ये तथाकथित बग़ावत कोई नई बात नहीं है, लेकिन राणे ने जिस मौके पर ये जूतमपैजार शुरू की है, उससे सबका सिर शर्म से झुक गया है।
जब देश आतंकवाद की आग में जल रहा हो, अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडोलिजा राइस समेत पूरी दुनिया के सियासतदान हिंदुस्तानी नेताओं को साथ मिल कर आतंकवाद से मुक़ाबला करने की सीख दे रहे हों, एक राष्ट्रीय संकट का माहौल हो, तब कुर्सी के लिए कांग्रेस में मची ये मारामारी सचमुच बहुत पीड़ादायक है। और राणे अपने ऊपर बाग़ी होने का टैग कुछ इस अंदाज़ में चस्पां कर रहे हैं, जैसे उन्होंने एक सड़ी हुई व्यवस्था के खिलाफ़ मुल्क और महाराष्ट्र के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया हो। ख़ुद को सीएम का दावेदार बताने में उनका जो 'कनविक्शन' दिखता है, उससे लगता है जैसे वे मराठी मानुष की सेवा करने के लिए मरे जा रहे हैं। दूसरी ओर, उन पर पलटवार करनेवाले भी कमतर नहीं हैं।
ये हालात कमोबेश हर हिंदुस्तानी के दिलो-दिमाग़ को झकझोर देता है। सवाल, बस एक ही है कि जब नेताओं का सारा ज़ोर सिर्फ़ और सिर्फ़ कुर्सी हासिल करने पर हो, वे भला मुल्क की की हिफ़ाज़त कैसे करेंगे?
Tuesday, 2 December 2008
आतंकवाद - कैसे तय हो राजनीतिक जवाबदेही?
ये वो दौर है, जब हक़ीक़त और फ़साने का फ़र्क ख़त्म हो गया है। वीडियो गेम का शैतान जिस आसानी से लोगों को मारता है, ठीक उसी तरह हक़ीक़त की ज़िंदगी में भी शैतान इंसानों को मार रहे हैं। ये कोई पहला मौका नहीं है जब हिंदुस्तान पर आतंकवादियों ने हमला किया है... कभी असम, कभी जयपुर, कभी दिल्ली, कभी मुंबई, कभी बैंगलुरू, तो कभी हैदराबाद... हिंदुस्तान के नक्शे पर अब शायद ही कोई ऐसी जगह बची हो, जहां आतंकवादियों के नापाक कदम नहीं पड़े। मौत का तांडव नहीं हुआ। लेकिन ज़रा सोचिए... एक मुल्क, एक राष्ट्र के तौर पर हमने आतंकवादियों से निपटने के लिए क्या किया? सच पूछिए तो जो कुछ भी किया, उसमें कुछ भी ऐसा नहीं था जिससे आतंकवादियों को दोबारा ऐसा करने से रोका जा सकता। और यही वजह है कि आज हमारा मुल्क पूरी दुनिया के आतंकवादियों के लिए सॉफ्ट टार्गेट बन चुका है।
एक वारदात को 24 घंटे का वक्त भी नहीं गुज़रता है कि दूसरी वारदात रोज़मर्रा की ज़िंदगी थर्रा देती है। अब ये हमारी फ़ितरत है या कुछ और, हम हर बार हम अपना गुस्सा ज़ब्त कर ख़ामोश रह जाते हैं और ख़ैर मनाते हैं कि खुद सलामत रह गए। लेकिन अब मुंबई में हुए हमले के बाद जागने का वक़्त आ गया है। वैसे अब मुझे अपने चारों ओर एक अजीब सी बेचैनी दिखने लगी है। देर से ही सही अब लोग ये सोचने पर मजबूर होने लगे हैं कि इस हालात का सामना आखिर कैसे किया जाए? ऐसा क्या हो, जिससे हिंदुस्तान आतंकवादियों का सॉफ्ट टार्गेट न बन सके? यकीनन, पिछले कई दिनों से ये सवाल मेरे दिलो-दिमाग में भी कौंध रहे हैं। जब-जब आतंकवादी हमले की बात चलती है या टीवी पर मुंबई के हमले का मंज़र देखता हूं, तब-तब एक अजीब सी मनहूसियत छाने लगती है। और फिर काफी कोशिश के बाद ही नॉर्मल हो पाता हूं।
मैं कोई सुरक्षा विशेषज्ञ नहीं हूं और ना ही स्ट्रैटेजिस्ट हूं। लिहाज़ा आतंकवाद से बचने के लिए कोई बहुत टेक्नीकल बात नहीं कर सकता। लेकिन मोटे तौर पर जो चंद बातें मुझे समझ में आती है, उन्हें आपके साथ साझा करना चाहता हूं। और इन बातों में सबसे ऊपर है ख़ुफ़िया एजेंसियों की भूमिका। हमारे देश में होनेवाले हर आतंकी हमले के साथ ही ख़ुफ़िया एजेंसियों की पोल खुल जाती है। कभी हमले के बाद एजेंसियां सरकारों को पहले ही आगाह किए जाने की बात कहती हैं, तो कभी गृहमंत्री कहते हैं कि हमले ठीक कब और कहां हमले होंगे, ये नहीं बताया गया था। ज़ाहिर है कि ये हमारे देश के सिपहसालारों और एजेंसियों के बीच तालमेल की घोर कमी का सुबूत है। और अब इस कमी से निबटने की ज़रूरत शिद्दत से महसूस होने लगी है। ज़रूरत इस बात की भी है कि सुरक्षा एजेंसियों को नख-दंत दिए जाएं, ताकि किसी भी आपातकालीन हालात का वे मज़बूती से मुक़ाबला कर सकें।
आतंकवाद पर राजनीति ख़त्म करना भी हिंदुस्तान को मजबूत करने की अहम ज़रूरतों में से एक है। इसके लिए सबसे पहले हमें दहशतगर्दी को किसी मज़हब के चश्मे से देखने की आदत बंद करनी होगी। साथ ही लोगों के चुने हुए नुमाइंदों को भी अपने वोट बैंक की चिंता कम करते हुए आतंकवादियों के खिलाफ़ कड़े फ़ैसले करने होंगे। जब तक मुल्क के स्वाभिमान पर हमला करनेवाले अफ़ज़ल गुरु जैसे आतंकवादियों को फांसी के फंदे पर लटकाया नहीं जाएगा, तब तक दहशतगर्दी का कारोबार करनेवाले लोगों तक सख्त मैसेज नहीं पहुंचेगा। उनके नापाक हौसले भी कम नहीं होंगे। ठीक इसी तरह आतंकवादियों से नेगोशिएट करने और हर आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तान से सिर्फ़ बातचीत के सहारे रिश्ते सुधार लेने का ख्वाब देखने की आदत भी बंद करनी होगी। इस मामले में हमें इज़रायल और अमेरिका जैसे मुल्कों के सबक लेना चाहिए, जिन्होंने अपने आस-पास पनपनेवाले आतंक की अमरबेल को उखाड़ फेंकने में कोई कमी नहीं छोड़ी।
लेकिन ये सभी ख्वाब तभी पूरे हो सकेंगे, जब राजनेताओं को शर्म आएगी। एक मुकम्मल राजनीतिक इच्छाशक्ति पैदा होगी। लेकिन जब नकवी, अच्यूतानंद और पाटील जैसे लोग हमलों के बाद दहशतज़दा लोगों पर ही ऊंगली उठाने लगें और हर हाल में अपना दामन बचाने की कोशिश करें, वहां इस तरह की कोई भी कोशिश ख्याली पुलाव से अलग कोई भी शक्ल नहीं ले सकती। अब सवाल ये उठता है कि आख़िर क्या हो कि राजनेता जिम्मेदार बनें और उनकी एकाउंटिब्लिटी फिक्स हो? यकीनन अब देश को इस सवाल पर सोचने की ज़रूरत है। साथ ही ज़रूरत है कि अपने हर उस राजनेता का गिरेबान पकड़ने की, जो वोट की ख़ातिर तो जनता के पैरों पर लोट जाते हैं, लेकिन कुर्सी तक पहुंचते ही उसी जनता को आंखें दिखाने से गुरेज नहीं करते। अब जगने का वक़्त आ गया है।
एक वारदात को 24 घंटे का वक्त भी नहीं गुज़रता है कि दूसरी वारदात रोज़मर्रा की ज़िंदगी थर्रा देती है। अब ये हमारी फ़ितरत है या कुछ और, हम हर बार हम अपना गुस्सा ज़ब्त कर ख़ामोश रह जाते हैं और ख़ैर मनाते हैं कि खुद सलामत रह गए। लेकिन अब मुंबई में हुए हमले के बाद जागने का वक़्त आ गया है। वैसे अब मुझे अपने चारों ओर एक अजीब सी बेचैनी दिखने लगी है। देर से ही सही अब लोग ये सोचने पर मजबूर होने लगे हैं कि इस हालात का सामना आखिर कैसे किया जाए? ऐसा क्या हो, जिससे हिंदुस्तान आतंकवादियों का सॉफ्ट टार्गेट न बन सके? यकीनन, पिछले कई दिनों से ये सवाल मेरे दिलो-दिमाग में भी कौंध रहे हैं। जब-जब आतंकवादी हमले की बात चलती है या टीवी पर मुंबई के हमले का मंज़र देखता हूं, तब-तब एक अजीब सी मनहूसियत छाने लगती है। और फिर काफी कोशिश के बाद ही नॉर्मल हो पाता हूं।
मैं कोई सुरक्षा विशेषज्ञ नहीं हूं और ना ही स्ट्रैटेजिस्ट हूं। लिहाज़ा आतंकवाद से बचने के लिए कोई बहुत टेक्नीकल बात नहीं कर सकता। लेकिन मोटे तौर पर जो चंद बातें मुझे समझ में आती है, उन्हें आपके साथ साझा करना चाहता हूं। और इन बातों में सबसे ऊपर है ख़ुफ़िया एजेंसियों की भूमिका। हमारे देश में होनेवाले हर आतंकी हमले के साथ ही ख़ुफ़िया एजेंसियों की पोल खुल जाती है। कभी हमले के बाद एजेंसियां सरकारों को पहले ही आगाह किए जाने की बात कहती हैं, तो कभी गृहमंत्री कहते हैं कि हमले ठीक कब और कहां हमले होंगे, ये नहीं बताया गया था। ज़ाहिर है कि ये हमारे देश के सिपहसालारों और एजेंसियों के बीच तालमेल की घोर कमी का सुबूत है। और अब इस कमी से निबटने की ज़रूरत शिद्दत से महसूस होने लगी है। ज़रूरत इस बात की भी है कि सुरक्षा एजेंसियों को नख-दंत दिए जाएं, ताकि किसी भी आपातकालीन हालात का वे मज़बूती से मुक़ाबला कर सकें।
आतंकवाद पर राजनीति ख़त्म करना भी हिंदुस्तान को मजबूत करने की अहम ज़रूरतों में से एक है। इसके लिए सबसे पहले हमें दहशतगर्दी को किसी मज़हब के चश्मे से देखने की आदत बंद करनी होगी। साथ ही लोगों के चुने हुए नुमाइंदों को भी अपने वोट बैंक की चिंता कम करते हुए आतंकवादियों के खिलाफ़ कड़े फ़ैसले करने होंगे। जब तक मुल्क के स्वाभिमान पर हमला करनेवाले अफ़ज़ल गुरु जैसे आतंकवादियों को फांसी के फंदे पर लटकाया नहीं जाएगा, तब तक दहशतगर्दी का कारोबार करनेवाले लोगों तक सख्त मैसेज नहीं पहुंचेगा। उनके नापाक हौसले भी कम नहीं होंगे। ठीक इसी तरह आतंकवादियों से नेगोशिएट करने और हर आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तान से सिर्फ़ बातचीत के सहारे रिश्ते सुधार लेने का ख्वाब देखने की आदत भी बंद करनी होगी। इस मामले में हमें इज़रायल और अमेरिका जैसे मुल्कों के सबक लेना चाहिए, जिन्होंने अपने आस-पास पनपनेवाले आतंक की अमरबेल को उखाड़ फेंकने में कोई कमी नहीं छोड़ी।
लेकिन ये सभी ख्वाब तभी पूरे हो सकेंगे, जब राजनेताओं को शर्म आएगी। एक मुकम्मल राजनीतिक इच्छाशक्ति पैदा होगी। लेकिन जब नकवी, अच्यूतानंद और पाटील जैसे लोग हमलों के बाद दहशतज़दा लोगों पर ही ऊंगली उठाने लगें और हर हाल में अपना दामन बचाने की कोशिश करें, वहां इस तरह की कोई भी कोशिश ख्याली पुलाव से अलग कोई भी शक्ल नहीं ले सकती। अब सवाल ये उठता है कि आख़िर क्या हो कि राजनेता जिम्मेदार बनें और उनकी एकाउंटिब्लिटी फिक्स हो? यकीनन अब देश को इस सवाल पर सोचने की ज़रूरत है। साथ ही ज़रूरत है कि अपने हर उस राजनेता का गिरेबान पकड़ने की, जो वोट की ख़ातिर तो जनता के पैरों पर लोट जाते हैं, लेकिन कुर्सी तक पहुंचते ही उसी जनता को आंखें दिखाने से गुरेज नहीं करते। अब जगने का वक़्त आ गया है।
Thursday, 20 November 2008
हालात से नाउम्मीद होती ज़िंदगी!
आज अपने ब्लॉग पर चंद पंक्तियां मेरे दोस्त रवीश रंजन शुक्ला की कलम से। दिल्ली में रह कर पत्रकारिता कर रहे रवीश भी मेरी तरह एक छोटे शहर से हैं। रवीश की ख़ासियत ये है कि वे एक बेहद संवदेनशील इंसान हैं और अपने आस-पास होनेवाले तमाम वाकयों से खुद को अलग नहीं रख पाते। कुछ रोज़ पहले रवीश को एक वाकये ने बुरी तरह झकझोर कर रख दिया। उन्होंने मुझसे दिल की बात कही और मैंने ही उन्हें ये सब ब्लॉग पर लिखने का सुझाव दिया। बाकी जो भी है, आपके सामने है --
अभी थोड़े दिन पहले मैं दीपावली में अपने घर गया था। घर जाते ही पुराने दोस्तों की याद आती है। इन्हीं में से एक मेरा दोस्त था राकेश साहू। दरम्याना कद, मुस्कुराता सांवला चेहरा, ब्लैक बेल्ट खिलाड़ी। जिंदगी में सफलता या असफलता से कोई लेना देना नहीं। हमेशा दूसरों के काम आना, साहित्य पढ़ना और रंगकर्म में वक्त निकालना। बीएसएसी भी झोंके में पास कर डाली थी। हाल के दिनों में संपर्क उससे कम हो गया था, क्योंकि मैं अपने काम से फ़ारिग नहीं हो पाता और वो अपनी मटरगश्ती से। राकेश साहू अजीब था। वैसा ही अजीब जैसे किसी कस्बाई शहर का आम लड़का होता है।
जीवन में शायद उसने एक गलती की थी। शादी करने की। खैर, घर पहुंचने के दो दिन बाद एक दिन अचानक मेरे पास एक दोस्त महेंद्र का फोन आया। उससे पता चला कि राकेश साहू की हत्या हो गई। पुलिस ने आदतन बिना शिनाख्त किए उसकी लाश को जला डाला। मैं और महेंद्र हैरान। हमारी आंखों के सामने उसका चेहरा घूमा। हमने बहराईच की कोतवाली में जाकर खुद शिनाख्त करने का फैसला किया। कोतवाली की ओर जाते कई बार दिमाग ने कहा कि भगवान करे राकेश साहू की फोटो न हो। लेकिन मुंह में पान दबाए कोतवाल साहब ने बड़े नखरे दिखाकर फोटो दिखाया तो वो राकेश ही था। आंखें खुली, गर्दन पर गहरा ज़ख्म, हमारी सुधबुध थोड़े समय के लिए चली गई। थोड़ी देर बाद कोतवाल साहब को याद आई कि उनके सामने खड़े दो सज्जन में से एक पत्रकार है और दूसरा अधिकारी, तब कुर्सी मंगवाई, हमें बिठाया। और फिर शुरू की हत्या को दुर्घटना का जामा पहनाने की कहानी।
दरअसल शादी के बाद राकेश की अनबन उससे ससुराल वालों से थी और राकेश की शादी का मामला कोर्ट में चल रहा था। उसने खुद भी कई बार हत्या हो जाने की आशंका जताई थी। पुलिस को भी ये बात मालूम थी, लेकिन बहराईच पुलिस ने ना तो लाश की अलग-अलग एंगेल से फोटो करवाई ना ही कोई सबूत इकट्ठा करने की कोशिश की। राकेश के शरीर पर से शर्ट गायब थी। पैरों के जूते और मोजे नदारद थे। जेब से पैसे और मोबाइल गायब थे। कुछ भी तो ढूंढने की कोशिश नहीं की। क़त्ल का मकसद मौजूद था। मौके-ए-वारदात और पास की दीवार पर छिटके खून से पहली नज़र में ही ये हत्या का मामला लग रहा था। लेकिन पुलिस का कहना था कि टैक्टर के हल से कटकर उसकी मौत हुई है।
पुलिस का यह नाकारा रवैया देखकर हम हैरान थे। हम शाम को अखबार के दफ्तर पहुंचे। कुछ एक अखबारी दोस्तों के ज़रिए ख़बर छपवाने की कोशिश की लेकिन दो अखबारों को छोड़कर किसी को भी ये खबर नहीं लगी। सभी ने रोज़ाना मिलने वाले पुलिसवालों की दोस्ती का ख्याल रखा और कुछ भी पुलिस की जांच के खिलाफ न लिखकर वही लिखा जो पुलिस ने बताया। दूसरे दिन हमें फिर निराशा मिली लेकिन फिर भी हमने बहराईच के वयोवृद्ध साहित्यकार डा. लाल के ज़रिए कैंडल मार्च निकालने का मन बनाया और वहां के एसपी चंद्र प्रकाश से भी बात की। उन्होंने ज़रूर हमें भरोसा दिलाया कि यह मर्डर है और हम जांच कर रहे हैं, लेकिन घटना के २० दिन होने को हैं, अभी तक राकेश के हत्यारों का पता नहीं चला है। इसी बीच हमारे दोस्तों को अब आसपास के लोग ही समझा रहे हैं कि जाने वाला तो चला गया अब तुम क्यों दुश्मनी ले रहे हो?
हम निराश इसलिए भी हैं कि एक प्यारे दोस्त को तो हमने खोया, लेकिन उसके लिए कुछ ही न कर पाने का मलाल ज्यादा है। छोटे शहर से लेकर बड़े शहर तक ना जाने कितने लो प्रोफाइल राकेश इसी तरह मर जाते हैं, लेकिन पुलिस की तफ्तीश कितना भरोसा पैदा करती है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। ब्लॉग पर इस तरह का वाकया लिखने का मक़सद एक ही है कि अगर कोई इस तरह के मामलों में दिलचस्पी दिखाए और कुछ भी कर सके तो अच्छा है। साथ ही ये घटनाएं बताती है कि हम कितने लाचार हो जाते हैं। राकेश भले ही चला गया हो लेकिन हम ज़ुबानी जमाखर्च और रोज़ाना की पेशेवर कामकाज में इतने मसरुफ़ हैं कि हमसे कुछ होगा ऐसा नहीं लगता...
अभी थोड़े दिन पहले मैं दीपावली में अपने घर गया था। घर जाते ही पुराने दोस्तों की याद आती है। इन्हीं में से एक मेरा दोस्त था राकेश साहू। दरम्याना कद, मुस्कुराता सांवला चेहरा, ब्लैक बेल्ट खिलाड़ी। जिंदगी में सफलता या असफलता से कोई लेना देना नहीं। हमेशा दूसरों के काम आना, साहित्य पढ़ना और रंगकर्म में वक्त निकालना। बीएसएसी भी झोंके में पास कर डाली थी। हाल के दिनों में संपर्क उससे कम हो गया था, क्योंकि मैं अपने काम से फ़ारिग नहीं हो पाता और वो अपनी मटरगश्ती से। राकेश साहू अजीब था। वैसा ही अजीब जैसे किसी कस्बाई शहर का आम लड़का होता है।
जीवन में शायद उसने एक गलती की थी। शादी करने की। खैर, घर पहुंचने के दो दिन बाद एक दिन अचानक मेरे पास एक दोस्त महेंद्र का फोन आया। उससे पता चला कि राकेश साहू की हत्या हो गई। पुलिस ने आदतन बिना शिनाख्त किए उसकी लाश को जला डाला। मैं और महेंद्र हैरान। हमारी आंखों के सामने उसका चेहरा घूमा। हमने बहराईच की कोतवाली में जाकर खुद शिनाख्त करने का फैसला किया। कोतवाली की ओर जाते कई बार दिमाग ने कहा कि भगवान करे राकेश साहू की फोटो न हो। लेकिन मुंह में पान दबाए कोतवाल साहब ने बड़े नखरे दिखाकर फोटो दिखाया तो वो राकेश ही था। आंखें खुली, गर्दन पर गहरा ज़ख्म, हमारी सुधबुध थोड़े समय के लिए चली गई। थोड़ी देर बाद कोतवाल साहब को याद आई कि उनके सामने खड़े दो सज्जन में से एक पत्रकार है और दूसरा अधिकारी, तब कुर्सी मंगवाई, हमें बिठाया। और फिर शुरू की हत्या को दुर्घटना का जामा पहनाने की कहानी।
दरअसल शादी के बाद राकेश की अनबन उससे ससुराल वालों से थी और राकेश की शादी का मामला कोर्ट में चल रहा था। उसने खुद भी कई बार हत्या हो जाने की आशंका जताई थी। पुलिस को भी ये बात मालूम थी, लेकिन बहराईच पुलिस ने ना तो लाश की अलग-अलग एंगेल से फोटो करवाई ना ही कोई सबूत इकट्ठा करने की कोशिश की। राकेश के शरीर पर से शर्ट गायब थी। पैरों के जूते और मोजे नदारद थे। जेब से पैसे और मोबाइल गायब थे। कुछ भी तो ढूंढने की कोशिश नहीं की। क़त्ल का मकसद मौजूद था। मौके-ए-वारदात और पास की दीवार पर छिटके खून से पहली नज़र में ही ये हत्या का मामला लग रहा था। लेकिन पुलिस का कहना था कि टैक्टर के हल से कटकर उसकी मौत हुई है।
पुलिस का यह नाकारा रवैया देखकर हम हैरान थे। हम शाम को अखबार के दफ्तर पहुंचे। कुछ एक अखबारी दोस्तों के ज़रिए ख़बर छपवाने की कोशिश की लेकिन दो अखबारों को छोड़कर किसी को भी ये खबर नहीं लगी। सभी ने रोज़ाना मिलने वाले पुलिसवालों की दोस्ती का ख्याल रखा और कुछ भी पुलिस की जांच के खिलाफ न लिखकर वही लिखा जो पुलिस ने बताया। दूसरे दिन हमें फिर निराशा मिली लेकिन फिर भी हमने बहराईच के वयोवृद्ध साहित्यकार डा. लाल के ज़रिए कैंडल मार्च निकालने का मन बनाया और वहां के एसपी चंद्र प्रकाश से भी बात की। उन्होंने ज़रूर हमें भरोसा दिलाया कि यह मर्डर है और हम जांच कर रहे हैं, लेकिन घटना के २० दिन होने को हैं, अभी तक राकेश के हत्यारों का पता नहीं चला है। इसी बीच हमारे दोस्तों को अब आसपास के लोग ही समझा रहे हैं कि जाने वाला तो चला गया अब तुम क्यों दुश्मनी ले रहे हो?
हम निराश इसलिए भी हैं कि एक प्यारे दोस्त को तो हमने खोया, लेकिन उसके लिए कुछ ही न कर पाने का मलाल ज्यादा है। छोटे शहर से लेकर बड़े शहर तक ना जाने कितने लो प्रोफाइल राकेश इसी तरह मर जाते हैं, लेकिन पुलिस की तफ्तीश कितना भरोसा पैदा करती है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। ब्लॉग पर इस तरह का वाकया लिखने का मक़सद एक ही है कि अगर कोई इस तरह के मामलों में दिलचस्पी दिखाए और कुछ भी कर सके तो अच्छा है। साथ ही ये घटनाएं बताती है कि हम कितने लाचार हो जाते हैं। राकेश भले ही चला गया हो लेकिन हम ज़ुबानी जमाखर्च और रोज़ाना की पेशेवर कामकाज में इतने मसरुफ़ हैं कि हमसे कुछ होगा ऐसा नहीं लगता...
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