मेरे एक दोस्त ने कुछ रोज़ पहले मुझे एक फ़ोन किया। मेरे हैलो कहते ही वो शुरू हो गया। एक सांस में कह गया, "यार! आज हमारे मोहल्ले में एक बड़ी बात हो गई... मेरे घर के ठीक सामने एक लड़के को उस बाप ने सरेआम दो चांटे रसीद डाले। लड़का काफ़ी देर से गली में मोटरसाइकिल पर स्टंट दिखा रहा था। और उसके बाप को ग़ुस्सा आ गया।"
मैंने पूछा, "इसमें बड़ी बात क्या है?"
तो उसने कहा, "क्या बात करते हो, तुमने सुना नहीं! उसके फ़ादर ने उसे सरेआम दो थप्पड़ मारे।"
'बड़ी बात' तो मेरे समझ में नहीं आई, लेकिन मुझे अपना बचपन ज़रूर याद आ गया... वो बचपन, जिसमें ना तो हमारी शैतानियों का कोई हिसाब था और ना ही पिटने-पिटाने का... कई बार तो गलतफ़हमी में ही पीट दिए जाते थे और बात आई-गई हो जाती थी... आज मेरे दोस्त के बहाने एक किस्सा मेरे बचपन के दिनों का...
तभी मेरी उम्र कोई छह-सात साल रही होगी। शाम को अपने दोस्तों के साथ गली में खेल रहा था... खेल क्या था, किसी भी नई चीज़ को देख कर उसे अपना बताने की होड़ चल रही थी... मसलन, जैसे ही कोई कार गुज़री, तो मैंने झट से कह दिया, "ये मेरी कार है।" फिर कोई बाइक सवार गुज़रा तो किसी दोस्त ने कह दिया कि ये उसकी बाइक है... बस, कुछ ऐसा ही खेल था। सीधा-साधा... बिल्कुल बचपन जैसा। खेल अभी चल ही रहा था कि मोहल्ले में रहनेवाले एक अंकल वहां से गुज़रे। आंखों में मोटी काली ऐनक, गंजा सिर, सफ़ेद धोती-कुर्ता और मोटी काली मूंछों वाले वैद्यनाथ अंकल।
अंकल जैसे ही साइकिल से पास आए, मैंने चिल्ला कर कहा, "हमारा साइकिल", और खुशी के मारे उछल पड़ा। ख़ुशी इस बात की कि वैद्यनाथ अंकल के साइकिल पर इससे पहले कि किसी और दोस्त की नज़र पड़ती, मैंने उसे अपना कह दिया। बस इसी क़ामयाबी से कुछ इतना ख़ुश था, जैसे साइकिल सचमुच अपनी हो गई हो। लेकिन मेरी ये ख़ुशी तब काफ़ूर हो गई, जब गुस्से से तमतमाए अंकल अपनी साइकिल से उतर आए और मेरी कान उमेठ कर मुझसे पूछा, "बताओ तुमने कहा ये?" मैं बुरी तरह सहम गया। समझ में नहीं आया कि आख़िर मेरी गलती क्या है? फिर भी अंकल ने पूछा था, तो जवाब देना ही था। मैंने भी घबराते हुए 'हां' में सिर हिला दिया। अब अंकल आगबबूला हो गए। उनका गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा... कहा, "ठीक है। अभी दफ़्तर जाकर तुम्हारे पिताजी को बताता हूं कि तुम यहां क्या कर रहे हो?" इसके बाद कुछ देर तक तो अंकल का ख़ौफ़ दिलो-दिमाग़ पर छाया रहा, लेकिन फिर बचपन की मस्ती ने सबकुछ भुला दिया।
शाम हुई और पिताजी घर लौटे। अक्सर, मिठाई लेकर आते थे। और हम भी उनके आने की ख़ुशी में मचलने लगते। लेकिन उस दिन पिताजी का मूड उखड़ा हुआ था। मैं जैसे ही उनके पास पहुंचा, उन्होंने मेरी ताबड़तोड़ पिटाई शुरू कर दी। पिताजी कुछ इतने ग़ुस्से में थे कि बीच-बचाव के लिए मां को आना पड़ा। किसी तरह जान बची। मां तो इस पिटाई का सबब पूछ ही रही थी कि हिम्मत जुटा कर मैंने भी पूछ लिया कि आख़िर मुझे क्यों पीटा गया? बस फिर क्या था, पिताजी एक बार फिर ग़ुस्सा हो गए। उन्होंने मां से कहा, "तुम्हें पता है, ये आजकल सड़क पर खड़े हो कर आते-जाते लोगों को गालियां बक रहे हैं!" मैं हैरान... इस बार पिताजी से तो नहीं, लेकिन रोते-रोते मैंने मां से पूछा, "मैंने कब गाली दी?" मां ने यही सवाल पिताजी की तरफ़ उछाल दिया... अबकी पिताजी ने मुझसे पूछा, "तुम बताओ, क्या आज तुमने अपने वैद्यनाथ अंकल को 'अंधरा-शक्ल' नहीं कहा था?" कुछ देर सोच कर मैंने सारी बातें याद की और कहा, "नहीं।" अब पिताजी ने पूछा, "फिर क्या कहा था? अगर तुमने गाली नहीं दी, तो फिर वैद्यानाथ ने जब तुम्हारी कान उमेठी, तो तुमने हां क्यों कहा?" मैंने उन्हें पूरी कहानी सुनाई... और ये भी बताया कि वैद्यनाथ अंकल ने तब मेरे कान पकड़ कर सिर्फ़ इतना पूछा था, "बताओ तुमने कहा ये?" अब मैंने 'हमारा साइकिल' कहा था, सो डरते-डरते हां कह दिया था। फिर मैंने अपनी सफ़ाई में 'अंधरा-शक्ल' जैसी कोई गाली जानने से भी इनकार कर दिया। सचमुच, मुझे तब तक इस गाली का पता भी नहीं था... लेकिन अब सफ़ाई देकर भी क्या होता, जो होना था हो गया। मुझे याद है, अगले दिन सुबह पिताजी के साथ-साथ वैद्यनाथ अंकल ने भी मुझे सॉरी कहा...
Monday, 15 December 2008
Tuesday, 9 December 2008
दूसरों की निंदा करने का मंच बनते ब्लॉग!
पिछले 8 नवंबर को मैंने एक पोस्ट लिखा था -- "आप ब्लॉग क्यों लिखते हैं?" इस पोस्ट के ज़रिए मैं लोगों से ब्लॉग लिखने की सही-सही वजह जानना चाहता था। पोस्ट के बाद कुछ लोगों को मैंने अपनी ही तरह ब्लॉग लिखने की वजह ढूंढ़ता हुआ पाया, तो किसी को अपनी रचनात्मकता को आकार देने के लिए लिखता हुआ। लेकिन ब्लॉग की दुनिया को नज़दीक से देखने और समझने के बाद एक बात का पता ज़रूर चल गया। वो ये कि हम में से ज़्यादातर लोग सिर्फ़ और सिर्फ़ दूसरों की निंदा करने और उन्हें नीचा दिखाने के लिए ही ब्लॉग लिखते हैं। आपको मेरा ये नज़रिया अजीब लग सकता है, लेकिन मुझे यकीन है कि आप दिल से मेरी इस बात रो झूठला नहीं सकेंगे।
सौ में से अस्सी ब्लॉग तो सिर्फ़ मीन-मेख निकालने के लिए चल रहे हैं। कोई लोकतंत्र की खाल खींच रहा है, तो कोई मीडिया की खाल में भूसा भर रहा है, कोई साथी ब्लॉगिए को गरिया रहा है, तो कोई अपने ही बिरादरी को लानत भेज कर 'प्रगतिशील' बनने की कोशिश कर रहा है। कुल मिलाकर, माहौल बड़ा निराशाजनक है। अभी कल की बात ही ले लीजिए... मैंने एक ब्लॉग में किसी साथी को आतंकवाद के खिलाफ़ अभियान छेड़ने पर मीडिया की खिंचाई करते हुए पाया। गरज ये थी कि मीडिया आतंकवाद पर एसएमएस मांग कर लाखों रुपए के वारे-न्यारे कर रहा है। मोबाइल कंपनियों के हाथों की कठपुतली बन गया है। इन जनाब को तो इंडिया गेट और गेटवे ऑफ इंडिया पर मोमबत्ती जला कर आतंकवाद का विरोध करने में भी शोशेबाज़ी नज़र आई।
अब सवाल ये उठता है कि रोज़ाना इश्क फ़रमाने और अपने दोस्तों को नॉनवेज जोक्स भेजने के चक्कर में एसएमएस कर लाखों रुपए पानी की तरह बहानेवाली आबादी से अगर कुछ एसएमएस राष्ट्रीयता के नाम पर मंगा लिए गए, तो इसमें कौन सा पहाड़ टूट गया? क्या ज़िंदगी में हर काम या हर हरकत को सिर्फ़ और सिर्फ़ रुपए-पैसे के नज़रिए से ही देखना ठीक है? ये सही है कि बाज़ारवाद हर किसी पर हावी है और मीडिया भी इससे अछूता नहीं है। लेकिन मीडिया पर लानत बरसानेवाले लोगों को शायद कभी भी मीडिया के सामाजिक सरोकार नज़र नहीं आते। उन्हें मीडिया में ठुमके लगाती राखी सावंत और शराब पीकर हंगामा करते राजा चौधरी तो नज़र आते हैं लेकिन आतंकवादियों के हाथों मारे गए बेगुनाहों के लिए संवेदना प्रकट करती ख़बरे नहीं दिखतीं। उन्हें जेसिका लाल और नीतिश कटारा मर्डर केस का फॉलोअप नहीं दिखता। और नज़रिए के इस कानेपन से ही छिद्रान्वेषण की शुरुआत होती है।
मीडिया के बाद ब्लॉग की दुनिया में सबसे हॉट टॉपिक आजकल आतंकवाद ही है। लेकिन ज़्यादातर ब्लॉग आतंकवाद से निबटने के तौर-तरीकों और इससे बचने पर चर्चा करने की बजाय मज़हबी नज़रिए से आतंकवाद को देखने की कोशिश में ज़्यादा नज़र आते हैं। नेताओं को गाली देने का शगल तो ख़ैर पुराना है। ईमानदारी से कहूं तो मैंने भी बारहा नेताओं को उनकी करतूतों पर लानत भेजी है, लेकिन ये भी सच है कि लानत भेजने से आगे भी सोचने की कोशिश की है।
वैसे एक सुखद सच्चाई ये भी है कि कुछ रचनाशील लोग तमाम उतार चढ़ावों के बावजूद साहित्य सेवा में डटे हैं। और इससे भी अच्छी बात ये है कि साहित्य सेवा में डटे इन ब्लॉगरों की रीडरशिप ना सिर्फ़ अच्छी है, बल्कि ऐसे पोस्ट्स पर मिलनेवाली प्रतिक्रियाएं भी उत्साह बढ़ाती हैं। उम्मीद जगाती हैं। मौजूदा राजनीति पर मेरे एक पोस्ट "नेताओं को सिर्फ़ गालियां ही देंगे या कुछ करेंगे भी!" के प्रतिक्रिया में मेरे एक साथी अनूप शुक्ल ने चुटकी ली थी कि गालियां देते रहने का मज़ा ही कुछ और है। कहीं-ना-कहीं मुझे अनूप जी की बातों में भी सच्चाई नज़र आती है। लगता है कि ब्लॉग की दुनिया से अगर निंदा और खिंचाई जैसी चीज़ों को अलग कर दिया जाए, तो शायद कुछ बचे ही नहीं। बहरहाल, सबकुछ एक हद तक हो तो ही अच्छा लगता है।
सौ में से अस्सी ब्लॉग तो सिर्फ़ मीन-मेख निकालने के लिए चल रहे हैं। कोई लोकतंत्र की खाल खींच रहा है, तो कोई मीडिया की खाल में भूसा भर रहा है, कोई साथी ब्लॉगिए को गरिया रहा है, तो कोई अपने ही बिरादरी को लानत भेज कर 'प्रगतिशील' बनने की कोशिश कर रहा है। कुल मिलाकर, माहौल बड़ा निराशाजनक है। अभी कल की बात ही ले लीजिए... मैंने एक ब्लॉग में किसी साथी को आतंकवाद के खिलाफ़ अभियान छेड़ने पर मीडिया की खिंचाई करते हुए पाया। गरज ये थी कि मीडिया आतंकवाद पर एसएमएस मांग कर लाखों रुपए के वारे-न्यारे कर रहा है। मोबाइल कंपनियों के हाथों की कठपुतली बन गया है। इन जनाब को तो इंडिया गेट और गेटवे ऑफ इंडिया पर मोमबत्ती जला कर आतंकवाद का विरोध करने में भी शोशेबाज़ी नज़र आई।
अब सवाल ये उठता है कि रोज़ाना इश्क फ़रमाने और अपने दोस्तों को नॉनवेज जोक्स भेजने के चक्कर में एसएमएस कर लाखों रुपए पानी की तरह बहानेवाली आबादी से अगर कुछ एसएमएस राष्ट्रीयता के नाम पर मंगा लिए गए, तो इसमें कौन सा पहाड़ टूट गया? क्या ज़िंदगी में हर काम या हर हरकत को सिर्फ़ और सिर्फ़ रुपए-पैसे के नज़रिए से ही देखना ठीक है? ये सही है कि बाज़ारवाद हर किसी पर हावी है और मीडिया भी इससे अछूता नहीं है। लेकिन मीडिया पर लानत बरसानेवाले लोगों को शायद कभी भी मीडिया के सामाजिक सरोकार नज़र नहीं आते। उन्हें मीडिया में ठुमके लगाती राखी सावंत और शराब पीकर हंगामा करते राजा चौधरी तो नज़र आते हैं लेकिन आतंकवादियों के हाथों मारे गए बेगुनाहों के लिए संवेदना प्रकट करती ख़बरे नहीं दिखतीं। उन्हें जेसिका लाल और नीतिश कटारा मर्डर केस का फॉलोअप नहीं दिखता। और नज़रिए के इस कानेपन से ही छिद्रान्वेषण की शुरुआत होती है।
मीडिया के बाद ब्लॉग की दुनिया में सबसे हॉट टॉपिक आजकल आतंकवाद ही है। लेकिन ज़्यादातर ब्लॉग आतंकवाद से निबटने के तौर-तरीकों और इससे बचने पर चर्चा करने की बजाय मज़हबी नज़रिए से आतंकवाद को देखने की कोशिश में ज़्यादा नज़र आते हैं। नेताओं को गाली देने का शगल तो ख़ैर पुराना है। ईमानदारी से कहूं तो मैंने भी बारहा नेताओं को उनकी करतूतों पर लानत भेजी है, लेकिन ये भी सच है कि लानत भेजने से आगे भी सोचने की कोशिश की है।
वैसे एक सुखद सच्चाई ये भी है कि कुछ रचनाशील लोग तमाम उतार चढ़ावों के बावजूद साहित्य सेवा में डटे हैं। और इससे भी अच्छी बात ये है कि साहित्य सेवा में डटे इन ब्लॉगरों की रीडरशिप ना सिर्फ़ अच्छी है, बल्कि ऐसे पोस्ट्स पर मिलनेवाली प्रतिक्रियाएं भी उत्साह बढ़ाती हैं। उम्मीद जगाती हैं। मौजूदा राजनीति पर मेरे एक पोस्ट "नेताओं को सिर्फ़ गालियां ही देंगे या कुछ करेंगे भी!" के प्रतिक्रिया में मेरे एक साथी अनूप शुक्ल ने चुटकी ली थी कि गालियां देते रहने का मज़ा ही कुछ और है। कहीं-ना-कहीं मुझे अनूप जी की बातों में भी सच्चाई नज़र आती है। लगता है कि ब्लॉग की दुनिया से अगर निंदा और खिंचाई जैसी चीज़ों को अलग कर दिया जाए, तो शायद कुछ बचे ही नहीं। बहरहाल, सबकुछ एक हद तक हो तो ही अच्छा लगता है।
Saturday, 6 December 2008
नेताओं को सिर्फ़ गालियां ही देंगे या कुछ करेंगे भी!
नेताओं को गालियों तो सबने दे दी, लेकिन नेताओं को कैसे रास्ते पर लाया जाए इसके बारे में अब तक कम ही सोचा गया। जिसने भी सोचा उसने नेताओं को समंदर में डुबोने, गोली मारने या फिर चुनाव का बहिष्कार करने तक ही सोचा। लेकिन सवाल ये है कि क्या ऐसे देश चल सकता है? आखिर क्या हो कि नेता सही रास्ते पर आ जाएं और कुर्सीमोह त्याग कर मुल्क के बारे में सोचें? पिछले कुछ दिनों से, ख़ास कर मुंबई धमाकों के बाद से, इस बारे में लगातार चर्चाओं और विमर्श के दौर से गुज़र रहा था। लेकिन इसी बीच किसी साथी ने एक ऐसी कुंजी बताई, जो हमारे पास होने के बावजूद जानकारी के अभाव में हम अक्सर उसका इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं। ये उपाय दरअसल हमारे सांवैधानिक अधिकारों का ही एक ऐसा हिस्सा है, जिसके बारे में हमारे देश के ज़्यादातर नागरिक जानते ही नहीं। अच्छे-भले, पढ़े-लिखे और माहिर भी नहीं।
कई बार आपने लोगों को ये भी कहते हुए सुना होगा कि सारे नेता और सारी पार्टियां तो एक जैसी हैं, आप किसे भी वोट दीजिए क्या फ़र्क पड़ता है! लेकिन नहीं, फ़र्क पड़वाने का तरीक़ा भी संविधान ने हमें दिया है। 'कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल 1961' की धारा 49(0) के मुताबिक अगर आप चुनाव में खड़े किसी भी उम्मीदवार को अपना वोट देने के क़ाबिल नहीं समझते हैं, तो आप 'नो-वोटिंग' के ऑप्शन पर जा सकते हैं। इसके लिए मतदान केंद्र में मौजूद प्रेज़ाइडिंग ऑफ़िसर की मदद ली जा सकती है। आपको एक ख़ास फॉर्म भरना होगा और आपका 'नो-वोट' या फिर यूं कहें कि आपका विरोध दर्ज हो जाएगा।
अब आप ये पूछ सकते हैं कि भला इससे क्या फ़र्क पड़ता है? ये तो वोट का बहिष्कार करने जैसी बात हुई। लेकिन नहीं, ये वोट के बहिष्कार से अलग है। आपको जानकर अच्छा लगेगा कि अगर किसी चुनाव क्षेत्र में हुए मतदान में सबसे ज़्यादा वोट 'नो-वोट' की कैटेगरी में डाले गए, तो प्रावधान के मुताबिक चुनाव आयोग उस चुनाव क्षेत्र की वोटिंग ही रद्द कर देगा। यानि एक बात साफ़ हो जाएगी कि अगर इलाके की जनता को चुनाव में खड़ा कोई भी प्रत्याशी अपना नुमाइंदा बनने के क़ाबिल नहीं लगता है तो चुनाव आयोग उसे आप पर थोपेगा नहीं, बल्कि उसे दौड़ से ही बाहर कर देगा। अगली बार जब भी चुनाव होगा, तब वे प्रत्याशी चुनाव में खड़े नहीं हो सकेंगे, जो उस चुनाव क्षेत्र से पिछली बार अपनी क़िस्मत आज़मा रहे थे। मतलब साफ़ है कि नो-वोटिंग का ऑप्शन चुनकर आप ना सिर्फ़ नाक़ाबिल नेताओं को सदन तक जाने से रोक सकते हैं, बल्कि पढ़े-लिखे और समझदार लोगों की ऐसी नई पौध को भी अपना नुमाइंदा बना सकते हैं, जो आमतौर पर ईमानदार होने के बावजूद राजनीतिक पार्टियों में चमचागिरी में कमज़ोर होने की वजह से पीछे छूट जाते हैं।
कई बार आपने लोगों को ये भी कहते हुए सुना होगा कि सारे नेता और सारी पार्टियां तो एक जैसी हैं, आप किसे भी वोट दीजिए क्या फ़र्क पड़ता है! लेकिन नहीं, फ़र्क पड़वाने का तरीक़ा भी संविधान ने हमें दिया है। 'कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल 1961' की धारा 49(0) के मुताबिक अगर आप चुनाव में खड़े किसी भी उम्मीदवार को अपना वोट देने के क़ाबिल नहीं समझते हैं, तो आप 'नो-वोटिंग' के ऑप्शन पर जा सकते हैं। इसके लिए मतदान केंद्र में मौजूद प्रेज़ाइडिंग ऑफ़िसर की मदद ली जा सकती है। आपको एक ख़ास फॉर्म भरना होगा और आपका 'नो-वोट' या फिर यूं कहें कि आपका विरोध दर्ज हो जाएगा।
अब आप ये पूछ सकते हैं कि भला इससे क्या फ़र्क पड़ता है? ये तो वोट का बहिष्कार करने जैसी बात हुई। लेकिन नहीं, ये वोट के बहिष्कार से अलग है। आपको जानकर अच्छा लगेगा कि अगर किसी चुनाव क्षेत्र में हुए मतदान में सबसे ज़्यादा वोट 'नो-वोट' की कैटेगरी में डाले गए, तो प्रावधान के मुताबिक चुनाव आयोग उस चुनाव क्षेत्र की वोटिंग ही रद्द कर देगा। यानि एक बात साफ़ हो जाएगी कि अगर इलाके की जनता को चुनाव में खड़ा कोई भी प्रत्याशी अपना नुमाइंदा बनने के क़ाबिल नहीं लगता है तो चुनाव आयोग उसे आप पर थोपेगा नहीं, बल्कि उसे दौड़ से ही बाहर कर देगा। अगली बार जब भी चुनाव होगा, तब वे प्रत्याशी चुनाव में खड़े नहीं हो सकेंगे, जो उस चुनाव क्षेत्र से पिछली बार अपनी क़िस्मत आज़मा रहे थे। मतलब साफ़ है कि नो-वोटिंग का ऑप्शन चुनकर आप ना सिर्फ़ नाक़ाबिल नेताओं को सदन तक जाने से रोक सकते हैं, बल्कि पढ़े-लिखे और समझदार लोगों की ऐसी नई पौध को भी अपना नुमाइंदा बना सकते हैं, जो आमतौर पर ईमानदार होने के बावजूद राजनीतिक पार्टियों में चमचागिरी में कमज़ोर होने की वजह से पीछे छूट जाते हैं।
Friday, 5 December 2008
ऐसे नेता करेंगे मुल्क की हिफ़ाज़त?
जब भी अपने देश में नेताओं की हालत देखता हूं, तो बड़ी कोफ़्त होती है। सत्ता के लिए किसी भी हद तक नीचे गिरते इन लोगों को देख कर मन खट्टा हो जाता है। हर बार ये सोचता हूं कि अब नेताओं के बारे में कुछ नहीं लिखूंगा। लेकिन हर बार ख़ुद से हार जाता हूं और नेताओं की कारगुज़ारियों पर लिखने को मजबूर हो जाता हूं। लिखना इसलिए नहीं चाहता, क्योंकि उनके बारे में कुछ लिखना चिकने घड़े पर पानी डालने जैसा लगता है और लिखने से खुद को रोक इसलिए नहीं सकता क्योंकि नेताओं की करतूत देख कर ख़ून खौलने लगता है।
ये ताज़ी पोस्ट महाराष्ट्र में चल रही मौजूदा राजनीति के मद्देनज़र है। वैसे तो महाराष्ट्र पिछले कई महीनों से गंदी राजनीति की चपेट में है, लेकिन मुंबई के आतंकी हमलों के बाद इस राजनीति ने जो शक्ल अख्तियार की है, वो पहले से भी ज़्यादा भयानक है। मुंबई में हुए हमले के बाद एकबारगी ये लग रहा था, जैसे राज ठाकरे सरीखे लोगों को अक्ल आ गई होगी और उन्होंने मिल कर जीना सीख लिया होगा। हमले के तुरंत बाद राज ठाकरे की करतूतों को याद कर-कर के जिस तरह देश भर में लोगों ने एक-दूसरे को एसएमएस भेजे, उससे एक ऐसा माहौल बनता हुआ दिख रहा था। लेकिन अब मुंबई में जो कुछ हो रहा है उसे देख कर लगने लगा है कि वहां राज ठाकरे से भी बड़े-बड़े गए-बीते पहले से ही बैठे हुए हैं।
हज़ारों लोगों की जान जाने के बाद देश के गृहमंत्री शिवराज पाटील की नैतिकता जागी और भरे मन से उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा... उनकी देखा-देखी दूसरे 'खरबूजों' ने भी रंग बदले, लेकिन महाराष्ट्र के सीएम थे कि कुर्सी छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहे थे। ये और बात है कि वे बार-बार "मैंने आलाकमान को अपना इस्तीफ़ा ऑफ़र कर दिया है," का जुमला कह-कह कर ख़ुद को सत्तामोह से इतर दिखाने की कोशिश में जुटे थे... लेकिन आखिरकार वही हुआ, जिसका डर उन्हें खाये जा रहा था। आलाकमान के इशारे पर विलासराव देशमुख को सीएम की कुर्सी छोड़नी पड़ी। कांग्रेस ने भी कुछ सोच-समझ कर नांदेड़ के विधायक अशोक चव्हान की ताजपोशी का फ़ैसला कर लिया। लेकिन अभी पार्टी का ये फ़ैसला आया ही था कि राणे ऐसे गरजे कि हर कोई सन्न रह गया। राणे ने ना सिर्फ़ अशोक चव्हान को नाक़ाबिल बताया, बल्कि इससे पहले के मुख्यमंत्री देशमुख को भी नाकारा करार दिया। वैसे तो कुर्सी के लिए नेताओं की ये तथाकथित बग़ावत कोई नई बात नहीं है, लेकिन राणे ने जिस मौके पर ये जूतमपैजार शुरू की है, उससे सबका सिर शर्म से झुक गया है।
जब देश आतंकवाद की आग में जल रहा हो, अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडोलिजा राइस समेत पूरी दुनिया के सियासतदान हिंदुस्तानी नेताओं को साथ मिल कर आतंकवाद से मुक़ाबला करने की सीख दे रहे हों, एक राष्ट्रीय संकट का माहौल हो, तब कुर्सी के लिए कांग्रेस में मची ये मारामारी सचमुच बहुत पीड़ादायक है। और राणे अपने ऊपर बाग़ी होने का टैग कुछ इस अंदाज़ में चस्पां कर रहे हैं, जैसे उन्होंने एक सड़ी हुई व्यवस्था के खिलाफ़ मुल्क और महाराष्ट्र के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया हो। ख़ुद को सीएम का दावेदार बताने में उनका जो 'कनविक्शन' दिखता है, उससे लगता है जैसे वे मराठी मानुष की सेवा करने के लिए मरे जा रहे हैं। दूसरी ओर, उन पर पलटवार करनेवाले भी कमतर नहीं हैं।
ये हालात कमोबेश हर हिंदुस्तानी के दिलो-दिमाग़ को झकझोर देता है। सवाल, बस एक ही है कि जब नेताओं का सारा ज़ोर सिर्फ़ और सिर्फ़ कुर्सी हासिल करने पर हो, वे भला मुल्क की की हिफ़ाज़त कैसे करेंगे?
ये ताज़ी पोस्ट महाराष्ट्र में चल रही मौजूदा राजनीति के मद्देनज़र है। वैसे तो महाराष्ट्र पिछले कई महीनों से गंदी राजनीति की चपेट में है, लेकिन मुंबई के आतंकी हमलों के बाद इस राजनीति ने जो शक्ल अख्तियार की है, वो पहले से भी ज़्यादा भयानक है। मुंबई में हुए हमले के बाद एकबारगी ये लग रहा था, जैसे राज ठाकरे सरीखे लोगों को अक्ल आ गई होगी और उन्होंने मिल कर जीना सीख लिया होगा। हमले के तुरंत बाद राज ठाकरे की करतूतों को याद कर-कर के जिस तरह देश भर में लोगों ने एक-दूसरे को एसएमएस भेजे, उससे एक ऐसा माहौल बनता हुआ दिख रहा था। लेकिन अब मुंबई में जो कुछ हो रहा है उसे देख कर लगने लगा है कि वहां राज ठाकरे से भी बड़े-बड़े गए-बीते पहले से ही बैठे हुए हैं।
हज़ारों लोगों की जान जाने के बाद देश के गृहमंत्री शिवराज पाटील की नैतिकता जागी और भरे मन से उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा... उनकी देखा-देखी दूसरे 'खरबूजों' ने भी रंग बदले, लेकिन महाराष्ट्र के सीएम थे कि कुर्सी छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहे थे। ये और बात है कि वे बार-बार "मैंने आलाकमान को अपना इस्तीफ़ा ऑफ़र कर दिया है," का जुमला कह-कह कर ख़ुद को सत्तामोह से इतर दिखाने की कोशिश में जुटे थे... लेकिन आखिरकार वही हुआ, जिसका डर उन्हें खाये जा रहा था। आलाकमान के इशारे पर विलासराव देशमुख को सीएम की कुर्सी छोड़नी पड़ी। कांग्रेस ने भी कुछ सोच-समझ कर नांदेड़ के विधायक अशोक चव्हान की ताजपोशी का फ़ैसला कर लिया। लेकिन अभी पार्टी का ये फ़ैसला आया ही था कि राणे ऐसे गरजे कि हर कोई सन्न रह गया। राणे ने ना सिर्फ़ अशोक चव्हान को नाक़ाबिल बताया, बल्कि इससे पहले के मुख्यमंत्री देशमुख को भी नाकारा करार दिया। वैसे तो कुर्सी के लिए नेताओं की ये तथाकथित बग़ावत कोई नई बात नहीं है, लेकिन राणे ने जिस मौके पर ये जूतमपैजार शुरू की है, उससे सबका सिर शर्म से झुक गया है।
जब देश आतंकवाद की आग में जल रहा हो, अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडोलिजा राइस समेत पूरी दुनिया के सियासतदान हिंदुस्तानी नेताओं को साथ मिल कर आतंकवाद से मुक़ाबला करने की सीख दे रहे हों, एक राष्ट्रीय संकट का माहौल हो, तब कुर्सी के लिए कांग्रेस में मची ये मारामारी सचमुच बहुत पीड़ादायक है। और राणे अपने ऊपर बाग़ी होने का टैग कुछ इस अंदाज़ में चस्पां कर रहे हैं, जैसे उन्होंने एक सड़ी हुई व्यवस्था के खिलाफ़ मुल्क और महाराष्ट्र के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया हो। ख़ुद को सीएम का दावेदार बताने में उनका जो 'कनविक्शन' दिखता है, उससे लगता है जैसे वे मराठी मानुष की सेवा करने के लिए मरे जा रहे हैं। दूसरी ओर, उन पर पलटवार करनेवाले भी कमतर नहीं हैं।
ये हालात कमोबेश हर हिंदुस्तानी के दिलो-दिमाग़ को झकझोर देता है। सवाल, बस एक ही है कि जब नेताओं का सारा ज़ोर सिर्फ़ और सिर्फ़ कुर्सी हासिल करने पर हो, वे भला मुल्क की की हिफ़ाज़त कैसे करेंगे?
Tuesday, 2 December 2008
आतंकवाद - कैसे तय हो राजनीतिक जवाबदेही?
ये वो दौर है, जब हक़ीक़त और फ़साने का फ़र्क ख़त्म हो गया है। वीडियो गेम का शैतान जिस आसानी से लोगों को मारता है, ठीक उसी तरह हक़ीक़त की ज़िंदगी में भी शैतान इंसानों को मार रहे हैं। ये कोई पहला मौका नहीं है जब हिंदुस्तान पर आतंकवादियों ने हमला किया है... कभी असम, कभी जयपुर, कभी दिल्ली, कभी मुंबई, कभी बैंगलुरू, तो कभी हैदराबाद... हिंदुस्तान के नक्शे पर अब शायद ही कोई ऐसी जगह बची हो, जहां आतंकवादियों के नापाक कदम नहीं पड़े। मौत का तांडव नहीं हुआ। लेकिन ज़रा सोचिए... एक मुल्क, एक राष्ट्र के तौर पर हमने आतंकवादियों से निपटने के लिए क्या किया? सच पूछिए तो जो कुछ भी किया, उसमें कुछ भी ऐसा नहीं था जिससे आतंकवादियों को दोबारा ऐसा करने से रोका जा सकता। और यही वजह है कि आज हमारा मुल्क पूरी दुनिया के आतंकवादियों के लिए सॉफ्ट टार्गेट बन चुका है।
एक वारदात को 24 घंटे का वक्त भी नहीं गुज़रता है कि दूसरी वारदात रोज़मर्रा की ज़िंदगी थर्रा देती है। अब ये हमारी फ़ितरत है या कुछ और, हम हर बार हम अपना गुस्सा ज़ब्त कर ख़ामोश रह जाते हैं और ख़ैर मनाते हैं कि खुद सलामत रह गए। लेकिन अब मुंबई में हुए हमले के बाद जागने का वक़्त आ गया है। वैसे अब मुझे अपने चारों ओर एक अजीब सी बेचैनी दिखने लगी है। देर से ही सही अब लोग ये सोचने पर मजबूर होने लगे हैं कि इस हालात का सामना आखिर कैसे किया जाए? ऐसा क्या हो, जिससे हिंदुस्तान आतंकवादियों का सॉफ्ट टार्गेट न बन सके? यकीनन, पिछले कई दिनों से ये सवाल मेरे दिलो-दिमाग में भी कौंध रहे हैं। जब-जब आतंकवादी हमले की बात चलती है या टीवी पर मुंबई के हमले का मंज़र देखता हूं, तब-तब एक अजीब सी मनहूसियत छाने लगती है। और फिर काफी कोशिश के बाद ही नॉर्मल हो पाता हूं।
मैं कोई सुरक्षा विशेषज्ञ नहीं हूं और ना ही स्ट्रैटेजिस्ट हूं। लिहाज़ा आतंकवाद से बचने के लिए कोई बहुत टेक्नीकल बात नहीं कर सकता। लेकिन मोटे तौर पर जो चंद बातें मुझे समझ में आती है, उन्हें आपके साथ साझा करना चाहता हूं। और इन बातों में सबसे ऊपर है ख़ुफ़िया एजेंसियों की भूमिका। हमारे देश में होनेवाले हर आतंकी हमले के साथ ही ख़ुफ़िया एजेंसियों की पोल खुल जाती है। कभी हमले के बाद एजेंसियां सरकारों को पहले ही आगाह किए जाने की बात कहती हैं, तो कभी गृहमंत्री कहते हैं कि हमले ठीक कब और कहां हमले होंगे, ये नहीं बताया गया था। ज़ाहिर है कि ये हमारे देश के सिपहसालारों और एजेंसियों के बीच तालमेल की घोर कमी का सुबूत है। और अब इस कमी से निबटने की ज़रूरत शिद्दत से महसूस होने लगी है। ज़रूरत इस बात की भी है कि सुरक्षा एजेंसियों को नख-दंत दिए जाएं, ताकि किसी भी आपातकालीन हालात का वे मज़बूती से मुक़ाबला कर सकें।
आतंकवाद पर राजनीति ख़त्म करना भी हिंदुस्तान को मजबूत करने की अहम ज़रूरतों में से एक है। इसके लिए सबसे पहले हमें दहशतगर्दी को किसी मज़हब के चश्मे से देखने की आदत बंद करनी होगी। साथ ही लोगों के चुने हुए नुमाइंदों को भी अपने वोट बैंक की चिंता कम करते हुए आतंकवादियों के खिलाफ़ कड़े फ़ैसले करने होंगे। जब तक मुल्क के स्वाभिमान पर हमला करनेवाले अफ़ज़ल गुरु जैसे आतंकवादियों को फांसी के फंदे पर लटकाया नहीं जाएगा, तब तक दहशतगर्दी का कारोबार करनेवाले लोगों तक सख्त मैसेज नहीं पहुंचेगा। उनके नापाक हौसले भी कम नहीं होंगे। ठीक इसी तरह आतंकवादियों से नेगोशिएट करने और हर आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तान से सिर्फ़ बातचीत के सहारे रिश्ते सुधार लेने का ख्वाब देखने की आदत भी बंद करनी होगी। इस मामले में हमें इज़रायल और अमेरिका जैसे मुल्कों के सबक लेना चाहिए, जिन्होंने अपने आस-पास पनपनेवाले आतंक की अमरबेल को उखाड़ फेंकने में कोई कमी नहीं छोड़ी।
लेकिन ये सभी ख्वाब तभी पूरे हो सकेंगे, जब राजनेताओं को शर्म आएगी। एक मुकम्मल राजनीतिक इच्छाशक्ति पैदा होगी। लेकिन जब नकवी, अच्यूतानंद और पाटील जैसे लोग हमलों के बाद दहशतज़दा लोगों पर ही ऊंगली उठाने लगें और हर हाल में अपना दामन बचाने की कोशिश करें, वहां इस तरह की कोई भी कोशिश ख्याली पुलाव से अलग कोई भी शक्ल नहीं ले सकती। अब सवाल ये उठता है कि आख़िर क्या हो कि राजनेता जिम्मेदार बनें और उनकी एकाउंटिब्लिटी फिक्स हो? यकीनन अब देश को इस सवाल पर सोचने की ज़रूरत है। साथ ही ज़रूरत है कि अपने हर उस राजनेता का गिरेबान पकड़ने की, जो वोट की ख़ातिर तो जनता के पैरों पर लोट जाते हैं, लेकिन कुर्सी तक पहुंचते ही उसी जनता को आंखें दिखाने से गुरेज नहीं करते। अब जगने का वक़्त आ गया है।
एक वारदात को 24 घंटे का वक्त भी नहीं गुज़रता है कि दूसरी वारदात रोज़मर्रा की ज़िंदगी थर्रा देती है। अब ये हमारी फ़ितरत है या कुछ और, हम हर बार हम अपना गुस्सा ज़ब्त कर ख़ामोश रह जाते हैं और ख़ैर मनाते हैं कि खुद सलामत रह गए। लेकिन अब मुंबई में हुए हमले के बाद जागने का वक़्त आ गया है। वैसे अब मुझे अपने चारों ओर एक अजीब सी बेचैनी दिखने लगी है। देर से ही सही अब लोग ये सोचने पर मजबूर होने लगे हैं कि इस हालात का सामना आखिर कैसे किया जाए? ऐसा क्या हो, जिससे हिंदुस्तान आतंकवादियों का सॉफ्ट टार्गेट न बन सके? यकीनन, पिछले कई दिनों से ये सवाल मेरे दिलो-दिमाग में भी कौंध रहे हैं। जब-जब आतंकवादी हमले की बात चलती है या टीवी पर मुंबई के हमले का मंज़र देखता हूं, तब-तब एक अजीब सी मनहूसियत छाने लगती है। और फिर काफी कोशिश के बाद ही नॉर्मल हो पाता हूं।
मैं कोई सुरक्षा विशेषज्ञ नहीं हूं और ना ही स्ट्रैटेजिस्ट हूं। लिहाज़ा आतंकवाद से बचने के लिए कोई बहुत टेक्नीकल बात नहीं कर सकता। लेकिन मोटे तौर पर जो चंद बातें मुझे समझ में आती है, उन्हें आपके साथ साझा करना चाहता हूं। और इन बातों में सबसे ऊपर है ख़ुफ़िया एजेंसियों की भूमिका। हमारे देश में होनेवाले हर आतंकी हमले के साथ ही ख़ुफ़िया एजेंसियों की पोल खुल जाती है। कभी हमले के बाद एजेंसियां सरकारों को पहले ही आगाह किए जाने की बात कहती हैं, तो कभी गृहमंत्री कहते हैं कि हमले ठीक कब और कहां हमले होंगे, ये नहीं बताया गया था। ज़ाहिर है कि ये हमारे देश के सिपहसालारों और एजेंसियों के बीच तालमेल की घोर कमी का सुबूत है। और अब इस कमी से निबटने की ज़रूरत शिद्दत से महसूस होने लगी है। ज़रूरत इस बात की भी है कि सुरक्षा एजेंसियों को नख-दंत दिए जाएं, ताकि किसी भी आपातकालीन हालात का वे मज़बूती से मुक़ाबला कर सकें।
आतंकवाद पर राजनीति ख़त्म करना भी हिंदुस्तान को मजबूत करने की अहम ज़रूरतों में से एक है। इसके लिए सबसे पहले हमें दहशतगर्दी को किसी मज़हब के चश्मे से देखने की आदत बंद करनी होगी। साथ ही लोगों के चुने हुए नुमाइंदों को भी अपने वोट बैंक की चिंता कम करते हुए आतंकवादियों के खिलाफ़ कड़े फ़ैसले करने होंगे। जब तक मुल्क के स्वाभिमान पर हमला करनेवाले अफ़ज़ल गुरु जैसे आतंकवादियों को फांसी के फंदे पर लटकाया नहीं जाएगा, तब तक दहशतगर्दी का कारोबार करनेवाले लोगों तक सख्त मैसेज नहीं पहुंचेगा। उनके नापाक हौसले भी कम नहीं होंगे। ठीक इसी तरह आतंकवादियों से नेगोशिएट करने और हर आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तान से सिर्फ़ बातचीत के सहारे रिश्ते सुधार लेने का ख्वाब देखने की आदत भी बंद करनी होगी। इस मामले में हमें इज़रायल और अमेरिका जैसे मुल्कों के सबक लेना चाहिए, जिन्होंने अपने आस-पास पनपनेवाले आतंक की अमरबेल को उखाड़ फेंकने में कोई कमी नहीं छोड़ी।
लेकिन ये सभी ख्वाब तभी पूरे हो सकेंगे, जब राजनेताओं को शर्म आएगी। एक मुकम्मल राजनीतिक इच्छाशक्ति पैदा होगी। लेकिन जब नकवी, अच्यूतानंद और पाटील जैसे लोग हमलों के बाद दहशतज़दा लोगों पर ही ऊंगली उठाने लगें और हर हाल में अपना दामन बचाने की कोशिश करें, वहां इस तरह की कोई भी कोशिश ख्याली पुलाव से अलग कोई भी शक्ल नहीं ले सकती। अब सवाल ये उठता है कि आख़िर क्या हो कि राजनेता जिम्मेदार बनें और उनकी एकाउंटिब्लिटी फिक्स हो? यकीनन अब देश को इस सवाल पर सोचने की ज़रूरत है। साथ ही ज़रूरत है कि अपने हर उस राजनेता का गिरेबान पकड़ने की, जो वोट की ख़ातिर तो जनता के पैरों पर लोट जाते हैं, लेकिन कुर्सी तक पहुंचते ही उसी जनता को आंखें दिखाने से गुरेज नहीं करते। अब जगने का वक़्त आ गया है।
Thursday, 20 November 2008
हालात से नाउम्मीद होती ज़िंदगी!
आज अपने ब्लॉग पर चंद पंक्तियां मेरे दोस्त रवीश रंजन शुक्ला की कलम से। दिल्ली में रह कर पत्रकारिता कर रहे रवीश भी मेरी तरह एक छोटे शहर से हैं। रवीश की ख़ासियत ये है कि वे एक बेहद संवदेनशील इंसान हैं और अपने आस-पास होनेवाले तमाम वाकयों से खुद को अलग नहीं रख पाते। कुछ रोज़ पहले रवीश को एक वाकये ने बुरी तरह झकझोर कर रख दिया। उन्होंने मुझसे दिल की बात कही और मैंने ही उन्हें ये सब ब्लॉग पर लिखने का सुझाव दिया। बाकी जो भी है, आपके सामने है --
अभी थोड़े दिन पहले मैं दीपावली में अपने घर गया था। घर जाते ही पुराने दोस्तों की याद आती है। इन्हीं में से एक मेरा दोस्त था राकेश साहू। दरम्याना कद, मुस्कुराता सांवला चेहरा, ब्लैक बेल्ट खिलाड़ी। जिंदगी में सफलता या असफलता से कोई लेना देना नहीं। हमेशा दूसरों के काम आना, साहित्य पढ़ना और रंगकर्म में वक्त निकालना। बीएसएसी भी झोंके में पास कर डाली थी। हाल के दिनों में संपर्क उससे कम हो गया था, क्योंकि मैं अपने काम से फ़ारिग नहीं हो पाता और वो अपनी मटरगश्ती से। राकेश साहू अजीब था। वैसा ही अजीब जैसे किसी कस्बाई शहर का आम लड़का होता है।
जीवन में शायद उसने एक गलती की थी। शादी करने की। खैर, घर पहुंचने के दो दिन बाद एक दिन अचानक मेरे पास एक दोस्त महेंद्र का फोन आया। उससे पता चला कि राकेश साहू की हत्या हो गई। पुलिस ने आदतन बिना शिनाख्त किए उसकी लाश को जला डाला। मैं और महेंद्र हैरान। हमारी आंखों के सामने उसका चेहरा घूमा। हमने बहराईच की कोतवाली में जाकर खुद शिनाख्त करने का फैसला किया। कोतवाली की ओर जाते कई बार दिमाग ने कहा कि भगवान करे राकेश साहू की फोटो न हो। लेकिन मुंह में पान दबाए कोतवाल साहब ने बड़े नखरे दिखाकर फोटो दिखाया तो वो राकेश ही था। आंखें खुली, गर्दन पर गहरा ज़ख्म, हमारी सुधबुध थोड़े समय के लिए चली गई। थोड़ी देर बाद कोतवाल साहब को याद आई कि उनके सामने खड़े दो सज्जन में से एक पत्रकार है और दूसरा अधिकारी, तब कुर्सी मंगवाई, हमें बिठाया। और फिर शुरू की हत्या को दुर्घटना का जामा पहनाने की कहानी।
दरअसल शादी के बाद राकेश की अनबन उससे ससुराल वालों से थी और राकेश की शादी का मामला कोर्ट में चल रहा था। उसने खुद भी कई बार हत्या हो जाने की आशंका जताई थी। पुलिस को भी ये बात मालूम थी, लेकिन बहराईच पुलिस ने ना तो लाश की अलग-अलग एंगेल से फोटो करवाई ना ही कोई सबूत इकट्ठा करने की कोशिश की। राकेश के शरीर पर से शर्ट गायब थी। पैरों के जूते और मोजे नदारद थे। जेब से पैसे और मोबाइल गायब थे। कुछ भी तो ढूंढने की कोशिश नहीं की। क़त्ल का मकसद मौजूद था। मौके-ए-वारदात और पास की दीवार पर छिटके खून से पहली नज़र में ही ये हत्या का मामला लग रहा था। लेकिन पुलिस का कहना था कि टैक्टर के हल से कटकर उसकी मौत हुई है।
पुलिस का यह नाकारा रवैया देखकर हम हैरान थे। हम शाम को अखबार के दफ्तर पहुंचे। कुछ एक अखबारी दोस्तों के ज़रिए ख़बर छपवाने की कोशिश की लेकिन दो अखबारों को छोड़कर किसी को भी ये खबर नहीं लगी। सभी ने रोज़ाना मिलने वाले पुलिसवालों की दोस्ती का ख्याल रखा और कुछ भी पुलिस की जांच के खिलाफ न लिखकर वही लिखा जो पुलिस ने बताया। दूसरे दिन हमें फिर निराशा मिली लेकिन फिर भी हमने बहराईच के वयोवृद्ध साहित्यकार डा. लाल के ज़रिए कैंडल मार्च निकालने का मन बनाया और वहां के एसपी चंद्र प्रकाश से भी बात की। उन्होंने ज़रूर हमें भरोसा दिलाया कि यह मर्डर है और हम जांच कर रहे हैं, लेकिन घटना के २० दिन होने को हैं, अभी तक राकेश के हत्यारों का पता नहीं चला है। इसी बीच हमारे दोस्तों को अब आसपास के लोग ही समझा रहे हैं कि जाने वाला तो चला गया अब तुम क्यों दुश्मनी ले रहे हो?
हम निराश इसलिए भी हैं कि एक प्यारे दोस्त को तो हमने खोया, लेकिन उसके लिए कुछ ही न कर पाने का मलाल ज्यादा है। छोटे शहर से लेकर बड़े शहर तक ना जाने कितने लो प्रोफाइल राकेश इसी तरह मर जाते हैं, लेकिन पुलिस की तफ्तीश कितना भरोसा पैदा करती है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। ब्लॉग पर इस तरह का वाकया लिखने का मक़सद एक ही है कि अगर कोई इस तरह के मामलों में दिलचस्पी दिखाए और कुछ भी कर सके तो अच्छा है। साथ ही ये घटनाएं बताती है कि हम कितने लाचार हो जाते हैं। राकेश भले ही चला गया हो लेकिन हम ज़ुबानी जमाखर्च और रोज़ाना की पेशेवर कामकाज में इतने मसरुफ़ हैं कि हमसे कुछ होगा ऐसा नहीं लगता...
अभी थोड़े दिन पहले मैं दीपावली में अपने घर गया था। घर जाते ही पुराने दोस्तों की याद आती है। इन्हीं में से एक मेरा दोस्त था राकेश साहू। दरम्याना कद, मुस्कुराता सांवला चेहरा, ब्लैक बेल्ट खिलाड़ी। जिंदगी में सफलता या असफलता से कोई लेना देना नहीं। हमेशा दूसरों के काम आना, साहित्य पढ़ना और रंगकर्म में वक्त निकालना। बीएसएसी भी झोंके में पास कर डाली थी। हाल के दिनों में संपर्क उससे कम हो गया था, क्योंकि मैं अपने काम से फ़ारिग नहीं हो पाता और वो अपनी मटरगश्ती से। राकेश साहू अजीब था। वैसा ही अजीब जैसे किसी कस्बाई शहर का आम लड़का होता है।
जीवन में शायद उसने एक गलती की थी। शादी करने की। खैर, घर पहुंचने के दो दिन बाद एक दिन अचानक मेरे पास एक दोस्त महेंद्र का फोन आया। उससे पता चला कि राकेश साहू की हत्या हो गई। पुलिस ने आदतन बिना शिनाख्त किए उसकी लाश को जला डाला। मैं और महेंद्र हैरान। हमारी आंखों के सामने उसका चेहरा घूमा। हमने बहराईच की कोतवाली में जाकर खुद शिनाख्त करने का फैसला किया। कोतवाली की ओर जाते कई बार दिमाग ने कहा कि भगवान करे राकेश साहू की फोटो न हो। लेकिन मुंह में पान दबाए कोतवाल साहब ने बड़े नखरे दिखाकर फोटो दिखाया तो वो राकेश ही था। आंखें खुली, गर्दन पर गहरा ज़ख्म, हमारी सुधबुध थोड़े समय के लिए चली गई। थोड़ी देर बाद कोतवाल साहब को याद आई कि उनके सामने खड़े दो सज्जन में से एक पत्रकार है और दूसरा अधिकारी, तब कुर्सी मंगवाई, हमें बिठाया। और फिर शुरू की हत्या को दुर्घटना का जामा पहनाने की कहानी।
दरअसल शादी के बाद राकेश की अनबन उससे ससुराल वालों से थी और राकेश की शादी का मामला कोर्ट में चल रहा था। उसने खुद भी कई बार हत्या हो जाने की आशंका जताई थी। पुलिस को भी ये बात मालूम थी, लेकिन बहराईच पुलिस ने ना तो लाश की अलग-अलग एंगेल से फोटो करवाई ना ही कोई सबूत इकट्ठा करने की कोशिश की। राकेश के शरीर पर से शर्ट गायब थी। पैरों के जूते और मोजे नदारद थे। जेब से पैसे और मोबाइल गायब थे। कुछ भी तो ढूंढने की कोशिश नहीं की। क़त्ल का मकसद मौजूद था। मौके-ए-वारदात और पास की दीवार पर छिटके खून से पहली नज़र में ही ये हत्या का मामला लग रहा था। लेकिन पुलिस का कहना था कि टैक्टर के हल से कटकर उसकी मौत हुई है।
पुलिस का यह नाकारा रवैया देखकर हम हैरान थे। हम शाम को अखबार के दफ्तर पहुंचे। कुछ एक अखबारी दोस्तों के ज़रिए ख़बर छपवाने की कोशिश की लेकिन दो अखबारों को छोड़कर किसी को भी ये खबर नहीं लगी। सभी ने रोज़ाना मिलने वाले पुलिसवालों की दोस्ती का ख्याल रखा और कुछ भी पुलिस की जांच के खिलाफ न लिखकर वही लिखा जो पुलिस ने बताया। दूसरे दिन हमें फिर निराशा मिली लेकिन फिर भी हमने बहराईच के वयोवृद्ध साहित्यकार डा. लाल के ज़रिए कैंडल मार्च निकालने का मन बनाया और वहां के एसपी चंद्र प्रकाश से भी बात की। उन्होंने ज़रूर हमें भरोसा दिलाया कि यह मर्डर है और हम जांच कर रहे हैं, लेकिन घटना के २० दिन होने को हैं, अभी तक राकेश के हत्यारों का पता नहीं चला है। इसी बीच हमारे दोस्तों को अब आसपास के लोग ही समझा रहे हैं कि जाने वाला तो चला गया अब तुम क्यों दुश्मनी ले रहे हो?
हम निराश इसलिए भी हैं कि एक प्यारे दोस्त को तो हमने खोया, लेकिन उसके लिए कुछ ही न कर पाने का मलाल ज्यादा है। छोटे शहर से लेकर बड़े शहर तक ना जाने कितने लो प्रोफाइल राकेश इसी तरह मर जाते हैं, लेकिन पुलिस की तफ्तीश कितना भरोसा पैदा करती है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। ब्लॉग पर इस तरह का वाकया लिखने का मक़सद एक ही है कि अगर कोई इस तरह के मामलों में दिलचस्पी दिखाए और कुछ भी कर सके तो अच्छा है। साथ ही ये घटनाएं बताती है कि हम कितने लाचार हो जाते हैं। राकेश भले ही चला गया हो लेकिन हम ज़ुबानी जमाखर्च और रोज़ाना की पेशेवर कामकाज में इतने मसरुफ़ हैं कि हमसे कुछ होगा ऐसा नहीं लगता...
Thursday, 13 November 2008
'फ़िक्सिंग' के ज़रिए 'फेस सेविंग'!
आस्ट्रेलिया के क्रिकेट फैन्स और वहां की मीडिया तिलमिला रही है। ऐसा लगता है कि जैसे किसी ने उनके बदन पर एक साथ हज़ारों चीटियां छोड़ दी हों। वे छटपटा रहे हैं और उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करें? कोई कहता है कि पॉटिंग को अब बाहर का रास्ता दिखाकर सायमंडस को वापस लाना चाहिए, कोई कहता है कि मैग्रा और गिलक्रिस्ट जैसी दूसरी प्रतिभाएं ढूंढ़नी चाहिए, तो कोई नागपुर टेस्ट को ही फिक्स बता कर अपनी खिसियाहट मिटाने में लगा है।
दरअसल, बॉर्डर-गावस्कर सीरीज़ पर टीम इंडिया का कब्जा सिर्फ़ हिंदुस्तान की जीत नहीं, बल्कि क्रिकेट आस्ट्रेलिया की हार भी है। और 10 नवंबर को ख़त्म हुए नागपुर टेस्ट को फिक्स करार देने में जुटी एक लॉबी ऐसा कर आस्ट्रेलिया की फेस सेविंग में जुटी है। उन्हें इसके लिए बूढ़े पॉटिंग समेत अपने ही चंद खिलाड़ियों की बलि देना तो गवारा है, लेकिन एक मुल्क के तौर पर आस्ट्रेलिया को हारते हुए देखना कुबूल नहीं।
वैसे नागपुर टेस्ट पर चाहे जितनी भी उंगलियां उठाई जाएं ये सच है कि इस हार ने आस्ट्रेलिया का गुरूर तोड़ दिया है। मैदान पर किसी भी तरीक़े से जीत हासिल करने पर यकीन रखनेवाले आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को भी ये समझ में आ गया है कि अब उनका किला पहले की तरह अजेय और अभेद्य नहीं रहा। यही वजह है कि लगातार दो टेस्ट मैचों में शिकस्त खाने के बाद अब एक सोची-समझी रणनीति के तहत नागपुर टेस्ट को फिक्स करार देने की कोशिश की जा रही है।
क्रिकेट की ख़बर रखनेवाले लोग ये अच्छी तरह जानते है कि इंटरनेशनल क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की एंटी करप्शन विंग आमतौर पर किसी भी इंटरनेशनल मैच की रिकॉर्डिंग का बारीकी से मुआयना करती है, ताकि जानबूझ कर हारने जैसी कोई बात नज़र आने पर कार्रवाई की जा सके। लेकिन अब एक लॉबी इस रुटीन अफ़ेयर को मुद्दा बना कर नागपुर मैच में टीम इंडिया की काबिलियत पर पानी फेरना चाहती है। तर्क दिये जा रहे हैं कि पहली पारी में हेडन और दूसरी पार्टी में पॉटिंग जिस तरह रन आउट हुए, आस्ट्रेलिया की ओर से मैदान पर जो फिल्डिंग सेट की गई, दूसरी पारी में जिस तरह महज़ दो रन प्रति ओवर की गति से रन बनाए गए और हरभजन जैसा पुछल्ला बल्लेबाज़ भी हाफ़ सेंचुरी लगा गया, वो सब मैच फिक्स होने का ही सुबूत था।
शुक्र है कि ऐसे तर्क गढ़नेवाले इस लॉबी ने दूसरी पारी में गांगुली और लक्ष्मण के सस्ते में आउट होने, सचिन के रन आउट होने, स्लिप पर फिल्डिंग कर रहे द्रविड़ द्वारा दो कैच छोड़ने और फिल्डिंग में कई बार काहिली का मुज़ाहिरा करनेवाले भारतीय खिलाड़ियों को अपनी ज़द में नहीं लिया। वैसे भी ऐसा कर ना तो उन्हें फ़ायदा होता और ना ही हार की खीझ समाप्त होती। ऐसे में फिक्सिंग को लेकर एक तरफ़ा नज़रिया ही 'फेस सेविंग' कर सकती थी। जिसकी कोशिश जारी है।
दरअसल, बॉर्डर-गावस्कर सीरीज़ पर टीम इंडिया का कब्जा सिर्फ़ हिंदुस्तान की जीत नहीं, बल्कि क्रिकेट आस्ट्रेलिया की हार भी है। और 10 नवंबर को ख़त्म हुए नागपुर टेस्ट को फिक्स करार देने में जुटी एक लॉबी ऐसा कर आस्ट्रेलिया की फेस सेविंग में जुटी है। उन्हें इसके लिए बूढ़े पॉटिंग समेत अपने ही चंद खिलाड़ियों की बलि देना तो गवारा है, लेकिन एक मुल्क के तौर पर आस्ट्रेलिया को हारते हुए देखना कुबूल नहीं।
वैसे नागपुर टेस्ट पर चाहे जितनी भी उंगलियां उठाई जाएं ये सच है कि इस हार ने आस्ट्रेलिया का गुरूर तोड़ दिया है। मैदान पर किसी भी तरीक़े से जीत हासिल करने पर यकीन रखनेवाले आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को भी ये समझ में आ गया है कि अब उनका किला पहले की तरह अजेय और अभेद्य नहीं रहा। यही वजह है कि लगातार दो टेस्ट मैचों में शिकस्त खाने के बाद अब एक सोची-समझी रणनीति के तहत नागपुर टेस्ट को फिक्स करार देने की कोशिश की जा रही है।
क्रिकेट की ख़बर रखनेवाले लोग ये अच्छी तरह जानते है कि इंटरनेशनल क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की एंटी करप्शन विंग आमतौर पर किसी भी इंटरनेशनल मैच की रिकॉर्डिंग का बारीकी से मुआयना करती है, ताकि जानबूझ कर हारने जैसी कोई बात नज़र आने पर कार्रवाई की जा सके। लेकिन अब एक लॉबी इस रुटीन अफ़ेयर को मुद्दा बना कर नागपुर मैच में टीम इंडिया की काबिलियत पर पानी फेरना चाहती है। तर्क दिये जा रहे हैं कि पहली पारी में हेडन और दूसरी पार्टी में पॉटिंग जिस तरह रन आउट हुए, आस्ट्रेलिया की ओर से मैदान पर जो फिल्डिंग सेट की गई, दूसरी पारी में जिस तरह महज़ दो रन प्रति ओवर की गति से रन बनाए गए और हरभजन जैसा पुछल्ला बल्लेबाज़ भी हाफ़ सेंचुरी लगा गया, वो सब मैच फिक्स होने का ही सुबूत था।
शुक्र है कि ऐसे तर्क गढ़नेवाले इस लॉबी ने दूसरी पारी में गांगुली और लक्ष्मण के सस्ते में आउट होने, सचिन के रन आउट होने, स्लिप पर फिल्डिंग कर रहे द्रविड़ द्वारा दो कैच छोड़ने और फिल्डिंग में कई बार काहिली का मुज़ाहिरा करनेवाले भारतीय खिलाड़ियों को अपनी ज़द में नहीं लिया। वैसे भी ऐसा कर ना तो उन्हें फ़ायदा होता और ना ही हार की खीझ समाप्त होती। ऐसे में फिक्सिंग को लेकर एक तरफ़ा नज़रिया ही 'फेस सेविंग' कर सकती थी। जिसकी कोशिश जारी है।
Monday, 10 November 2008
फ़्यूचर प्लानिंग
मैं जिस रास्ते से रोज़ दफ़्तर जाता हूं वो दिल्ली की सबसे व्यस्त और तेज़ सड़कों में एक है। एक ऐसा रास्ता, जहां आप अचानक अपनी गाड़ी रोकने की सोच भी नहीं सकते। क्योंकि आपने गाड़ी रोकी नहीं कि पीछे से आपको कोई ज़ोरदार टक्कर दे मारेगा। और अगर आपकी किस्मत अच्छी रही, तो फिर हॉर्न बजा-बजाकर लोग आपका दिमाग़ ख़राब कर देंगे।
इसी रास्ते में फुटपाथ पर मैं रोज़ एक भिखारी को देखता हूं। उसकी शक्ल-सूरत तो किसी भी दूसरे भिखारी जैसी है, लेकिन उसे मैंने कभी किसी के सामने हाथ फैला कर कुछ मांगते हुए नहीं देखा। हां, फुटपाथ पर बैठा-बैठा वो रोज़ आते-जाते लोगों को सलाम ज़रूर करता है। एक रोज़ उसने मुझे भी सलाम किया। पहले मुझे लगा कि उसने किसी और को विश किया होगा... लेकिन अगले दिन जब इत्तेफ़ाक से मेरी नज़र उस पर गई, तो वो उसी अंदाज़ में मुस्कुराता हुआ मुझे सलाम कर रहा था। मुझे बड़ी हैरानी हुई। अगले रोज़ मैंने उससे मिलने का फ़ैसला किया।
चूंकि मैं पहले से तैयार था... भिखारी के पास पहुंचते ही मैंने अपनी गाड़ी धीमी कर ली। उसे कुछ रुपए दिए और लोगों को सलाम करने की वजह पूछ ली। उसने कहा, 'मालिक, मैं तो यहां कल की फ़िक्र में बैठा हूं। आज की रोटी तो ऊपरवाले के हाथ है।' मैं हैरान था... एक मैले-कुचैले कपड़े में बैठे भिखारी की 'फ़्यूचर प्लानिंग' देखकर...
इसी रास्ते में फुटपाथ पर मैं रोज़ एक भिखारी को देखता हूं। उसकी शक्ल-सूरत तो किसी भी दूसरे भिखारी जैसी है, लेकिन उसे मैंने कभी किसी के सामने हाथ फैला कर कुछ मांगते हुए नहीं देखा। हां, फुटपाथ पर बैठा-बैठा वो रोज़ आते-जाते लोगों को सलाम ज़रूर करता है। एक रोज़ उसने मुझे भी सलाम किया। पहले मुझे लगा कि उसने किसी और को विश किया होगा... लेकिन अगले दिन जब इत्तेफ़ाक से मेरी नज़र उस पर गई, तो वो उसी अंदाज़ में मुस्कुराता हुआ मुझे सलाम कर रहा था। मुझे बड़ी हैरानी हुई। अगले रोज़ मैंने उससे मिलने का फ़ैसला किया।
चूंकि मैं पहले से तैयार था... भिखारी के पास पहुंचते ही मैंने अपनी गाड़ी धीमी कर ली। उसे कुछ रुपए दिए और लोगों को सलाम करने की वजह पूछ ली। उसने कहा, 'मालिक, मैं तो यहां कल की फ़िक्र में बैठा हूं। आज की रोटी तो ऊपरवाले के हाथ है।' मैं हैरान था... एक मैले-कुचैले कपड़े में बैठे भिखारी की 'फ़्यूचर प्लानिंग' देखकर...
Saturday, 8 November 2008
आप ब्लॉग क्यों लिखते हैं?
कोई ब्लॉग क्यों लिखता है? आप क्यों लिखते हैं? या फिर मैं ही ब्लॉग क्यों लिखता हूं?
मैं अक्सर इन सवालों के बारे में सोचता हूं। और मेरा दावा है कि आप भी ज़रूर सोचते होंगे। ये सवाल बेशक एक ही हैं। लेकिन इन चंद सवालों में कुछ इतने जबाव छिपे हैं कि बस पूछिए मत!
मन में उमड़ते-घुमड़ते ख्यालात को आकार देने के लिए, विरोध प्रकट करने के लिए, अपनी रचनात्मकता को अंजाम तक पहुंचाने के लिए, शेखी बघारने के लिए, पॉपुलर होने के लिए, दूसरों की बराबरी करने या फिर उनसे आगे निकलने के लिए, विवादित मसलों पर एक शिगूफ़ा छोड़ कर मज़ा लेने के लिए, जो बात दिल में ही घुट कर रह गई हो उसे उगलने के लिए, टाइम पास करने के लिए, ब्लॉगर कहलाने के लिए या फिर सिर्फ़ और सिर्फ़ लिखने के लिए? और शायद इन्हीं अनगिनत जवाबों में ब्लॉगिंग की दुनिया का अनोखापन भी छिपा है।
सच तो ये है कि अपना ब्लॉग शुरू करने से पहले भी मैं काफ़ी दिनों तक इस मसले पर सोचता रहा। ये भी सोचता रहा कि आख़िर मैं ब्लॉगिंग क्यों करूं? मेरे दोस्त अक्सर कहते थे कि सुप्रतिम तुम अच्छा लिख लेते हो, अपना कोई ब्लॉग क्यों नहीं शुरू करते? लेकिन दोस्तों से ऐसी बातें सुनते हुए तकरीबन साल भर का वक़्त गुज़ार देने के बाद जाकर ही मैं अपना ब्लॉग शुरू कर सका। हो सकता है कि दूसरों को इतना वक़्त ना लगता हो। वैसे भी हर शख्स के काम करने का अपना तरीक़ा होता है और हर काम का अपना वक़्त। शायद यही वजह है कि मुझे भी अपना ब्लॉग शुरू करने में इतना वक़्त लग गया। और 11 सितंबर 2008 को ब्लॉग शुरू करने के बाद इस मसले पर लिखने में और इतना...
अब तकरीबन दो महीने से ब्लॉग की दुनिया को नज़दीक से देख रहा हूं। इन दिनों में मैंने काफी कुछ देखा और सीखा है। माहिर ब्लॉगरों के कलम की धार देखी है और कोरी बकवास भी। सिर्फ़ लिखने के लिए लिखने वालों को भी देखा है और लोगों की नब्ज़ पर हाथ रखनेवालों को भी। कुछ मिशनरियों को भी देखा है और कुछ कनफ्यूज़्ड लोगों को भी। सच पूछिए तो हर शख्स, हर ब्लॉग और हर पोस्ट अपने-आप में अनोखापन लिए है। कहने को कोई ये भी कह सकता है कि वो अपना ब्लॉग स्वांत: सुखाय लिखता है, लेकिन ज़रा सोचिए कि ऐसी रचना या फिर ऐसा ब्लॉग, जिसे ना तो कभी किसी ने देखा हो और ना ही पढ़ा हो, वो किस काम का?
लेकिन इतना देखने और समझने के बावजूद मैं अपनी कैटेगरी अब तक तय नहीं कर पाया हूं। बहरहाल, मैं तो अपना ब्लॉग लिखने की वजह जानने की कोशिश में हूं... लेकिन अगर आप अपने बारे में हंड्रैड परसेंट श्योर हैं, तो मुझे ज़रूर बताएं...
मैं अक्सर इन सवालों के बारे में सोचता हूं। और मेरा दावा है कि आप भी ज़रूर सोचते होंगे। ये सवाल बेशक एक ही हैं। लेकिन इन चंद सवालों में कुछ इतने जबाव छिपे हैं कि बस पूछिए मत!
मन में उमड़ते-घुमड़ते ख्यालात को आकार देने के लिए, विरोध प्रकट करने के लिए, अपनी रचनात्मकता को अंजाम तक पहुंचाने के लिए, शेखी बघारने के लिए, पॉपुलर होने के लिए, दूसरों की बराबरी करने या फिर उनसे आगे निकलने के लिए, विवादित मसलों पर एक शिगूफ़ा छोड़ कर मज़ा लेने के लिए, जो बात दिल में ही घुट कर रह गई हो उसे उगलने के लिए, टाइम पास करने के लिए, ब्लॉगर कहलाने के लिए या फिर सिर्फ़ और सिर्फ़ लिखने के लिए? और शायद इन्हीं अनगिनत जवाबों में ब्लॉगिंग की दुनिया का अनोखापन भी छिपा है।
सच तो ये है कि अपना ब्लॉग शुरू करने से पहले भी मैं काफ़ी दिनों तक इस मसले पर सोचता रहा। ये भी सोचता रहा कि आख़िर मैं ब्लॉगिंग क्यों करूं? मेरे दोस्त अक्सर कहते थे कि सुप्रतिम तुम अच्छा लिख लेते हो, अपना कोई ब्लॉग क्यों नहीं शुरू करते? लेकिन दोस्तों से ऐसी बातें सुनते हुए तकरीबन साल भर का वक़्त गुज़ार देने के बाद जाकर ही मैं अपना ब्लॉग शुरू कर सका। हो सकता है कि दूसरों को इतना वक़्त ना लगता हो। वैसे भी हर शख्स के काम करने का अपना तरीक़ा होता है और हर काम का अपना वक़्त। शायद यही वजह है कि मुझे भी अपना ब्लॉग शुरू करने में इतना वक़्त लग गया। और 11 सितंबर 2008 को ब्लॉग शुरू करने के बाद इस मसले पर लिखने में और इतना...
अब तकरीबन दो महीने से ब्लॉग की दुनिया को नज़दीक से देख रहा हूं। इन दिनों में मैंने काफी कुछ देखा और सीखा है। माहिर ब्लॉगरों के कलम की धार देखी है और कोरी बकवास भी। सिर्फ़ लिखने के लिए लिखने वालों को भी देखा है और लोगों की नब्ज़ पर हाथ रखनेवालों को भी। कुछ मिशनरियों को भी देखा है और कुछ कनफ्यूज़्ड लोगों को भी। सच पूछिए तो हर शख्स, हर ब्लॉग और हर पोस्ट अपने-आप में अनोखापन लिए है। कहने को कोई ये भी कह सकता है कि वो अपना ब्लॉग स्वांत: सुखाय लिखता है, लेकिन ज़रा सोचिए कि ऐसी रचना या फिर ऐसा ब्लॉग, जिसे ना तो कभी किसी ने देखा हो और ना ही पढ़ा हो, वो किस काम का?
लेकिन इतना देखने और समझने के बावजूद मैं अपनी कैटेगरी अब तक तय नहीं कर पाया हूं। बहरहाल, मैं तो अपना ब्लॉग लिखने की वजह जानने की कोशिश में हूं... लेकिन अगर आप अपने बारे में हंड्रैड परसेंट श्योर हैं, तो मुझे ज़रूर बताएं...
Friday, 7 November 2008
आज भी हंसता हूं ख़ुद पर...
मेरा एक दोस्त है, जो अक्सर कहा करता है कि किसी पर हंसने से पहले इंसान को ख़ुद पर हंसने की आदत डालनी चाहिए। ये जुमला यकीनन उसका नहीं है। और ये बात भी वो हमेशा बेहद ईमानदारी से कुबूल करता है। लेकिन जब-जब वो अपने उम्र को पीछे छोड़ते हुए ये बात कहता है, तब-तब वो मुझे बहुत मैच्योर और सुलझा हुआ लगने लगता है। शायद इसलिए भी कि इस मामले में मैं भी उससे इत्तेफ़ाक रखता हूं। ...तो आज बात ख़ुद पर हंसने के एक वाकये की। आपको एक ऐसा क़िस्सा बताने जा रहा हूं, जिसे सुनकर आपको भी हैरानी होगी कि इंसान अपनी ज़िंदगी में जाने कैसी-कैसी नादानियां कर बैठता है।
उन दिनों मैंने मैट्रिक की परीक्षा दी थी। रिज़ल्ट का इंतज़ार था और इसी बीच पत्रकारिता का चस्का लग चुका था। मेरे एक सीनियर थे, निलय सेनगुप्ता। फ्रीलांस फ़ोटोग्राफ़र। जो अक्सर अखबार के दफ़्तरों से कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रमों के इनविटेशन कार्ड्स कवरेज के लिए मेरे पास लेकर आते थे। इस तरह वे मेरे जर्नलिज़्म के करियर की नींव डालने में जुटे थे। एक बार वो मेरे लिए एक बड़े थिएटर ग्रुप का इनविटेशन कार्ड लेकर आए। नाटक था -- 'एक एनार्किस्ट (अराजकतावादी) की इत्तेफ़ाकिया मौत'। रवींद्र भवन के शानदार एयरकंडिशंड हाल में नाटक होना था।
मैं प्रेस गैलरी में बैठकर नाटक देखने और उसका कवरेज करने के लिए जोश से लबालब भर उठा। अपनी एटलस रिबेल साइकिल ली और नाटक शुरू होने से तकरीबन आधा घंटा पहले ही रवींद्र भवन जा पहुंचा। वहां शान से इनविटेशन कार्ड दिखाकर प्रेस गैलरी में जा बैठा। नाटक शुरू हुआ और ज़्यादातर हिस्सा मेरे सिर के ऊपर से गुज़रने लगा। नाटक की कहानी ठीक क्या थी, मुझे नहीं पता। लेकिन जैसा कि नाम से पता चलता था, नाटक किसी अराजकतावादी शख्स की मौत को लेकर रहा होगा। बहरहाल, रिपोर्टिंग तो करनी थी। इसलिए नाटक बीच में छोड़कर नहीं लौट सकता था। सो, तकरीबन आधे घंटे तक चुपचाप सबकुछ देखता रहा।
नाटक लगातार आगे बढ़ रहा था। तभी अचानक हॉल के पिछले हिस्से से एक महिला "बंद करो ये नाटक... ये सब क्या हो रहा है... जो मन में आता है, बोलने लगते हो..." कहती हुई स्टेज की ओर दौड़ी। महिला की इस हरकत से पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। आयोजकों ने आनन-फानन में मंचन रोक दिया और कुछ देर के लिए पर्दा भी गिरा दिया गया। बस, फिर क्या था? मेरे अंदर का रिपोर्टर जाग उठा। मैंने अपने अगल-बगल देखा दूसरे पत्रकार भी इस 'नए नाटक' को लेकर आपस में बातें करने लगे। मुझे नाटक बीच में छोड़कर दफ़्तर पहुंचने का यही सबसे सही वक़्त लगा। तुरंत हॉल से बाहर निकला और अपनी साइकिल उठाकर दफ़्तर की ओर भागा।
उन दिनों मेरे एक सीनियर रतन जोशी अख़बार में कला-संस्कृति का पन्ना संभालते थे। हांफते-हांफते मैंने उन्हें पूरी कहानी सुनाई और बताया कि किस तरह नाटक के बीच में ही बवाल हो गया और आयोजकों को मंचन रोकना पड़ा। मेरे जोश को देखते हुए उन्होंने तुरंत मुझे सबकुछ लिख डालने की हिदायत दी। बस, मैंने भी पूरे लच्छेदार तरीके से जो कुछ देखा, लिख डाला। फिर अंत में रिपोर्ट के ऊपर अपना नाम भी मोटे अक्षरों में लिखा, ताकि अगले दिन सुबह के अख़बार में बाइलाइन रिपोर्ट छपी हो।
अगले दिन उठकर मैं सबसे पहले बस स्टैंड के न्यूज़पेपर स्टॉल पर पहुंचा। ये देखने के लिए मेरी बाइलाइन रिपोर्ट अख़बार में कैसे और कहां छपी है? लेकिन जब काफ़ी ढूंढ़ने के बाद भी मुझे अपनी बाइलाइन नहीं दिखी, तो मैंने ख़बरों की हैडिंग पढ़नी शुरू की। तब अंतिम पन्ने पर मुझे अपनी ख़बर दिखाई पड़ी। तीन कॉलम की ख़बर। लेकिन मेरा नाम नहीं छपा था, लिहाज़ा मैं बहुत निराश हुआ। मन ही मन रतन जी को भी कोसने लगा। लेकिन अभी चंद घंटे गुज़रे थे कि निलय सेनगुप्ता ने मुझे बुलवा भेजा। जब उनके पास पहुंचा, तो वे लाल-पीले हो रहे थे। उन्होंने मुझे बड़ी लानत दी और कहा कि अब तुम कभी जर्नलिस्ट नहीं बन सकते। उनका रौद्र रूप देखकर मुझे उनसे इसकी वजह पूछने की भी हिम्मत नहीं हुई। चुपचाप सिर झुकाए खड़ा रहा। हारकर उन्होंने ही मुझे बताया कि मेरी ग़लती क्या है। निलय दा ने कहा, 'कल रवींद्र भवन में तुमने जिसे हंगामा समझा, वो दरअसल नाटक का ही हिस्सा था। नाटक बीच में रुकवाई नहीं गई, कलाकारों ने ही जानबूझ कर रोकी थी।' मुझे बाकी बात समझने में देर नहीं हुई। ये भयानक ग़लती थी। निलय दा ने बताया कि किस तरह आज सुबह से ही अख़बार के दफ़्तर में फ़ोन आ रहे हैं और सारे लोग मज़ाक बना रहे हैं।
मैं बेहद शर्मिंदा था... और ये भी सोच रहा था कि अगर रतन जी ने उस रोज़ ग़लती से भी ख़बर के साथ मेरा नाम छाप दिया होता, तो मेरी क्या हालत होती...? ख़ैर, एक अच्छी बात ये थी कि बाद में ख़ुद निलय दा, रतन जी और दूसरे कई सीनियरों ने इतना होने के बावजूद मेरी ख़ूब हौसला अफ़ज़ायी की।
उन दिनों मैंने मैट्रिक की परीक्षा दी थी। रिज़ल्ट का इंतज़ार था और इसी बीच पत्रकारिता का चस्का लग चुका था। मेरे एक सीनियर थे, निलय सेनगुप्ता। फ्रीलांस फ़ोटोग्राफ़र। जो अक्सर अखबार के दफ़्तरों से कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रमों के इनविटेशन कार्ड्स कवरेज के लिए मेरे पास लेकर आते थे। इस तरह वे मेरे जर्नलिज़्म के करियर की नींव डालने में जुटे थे। एक बार वो मेरे लिए एक बड़े थिएटर ग्रुप का इनविटेशन कार्ड लेकर आए। नाटक था -- 'एक एनार्किस्ट (अराजकतावादी) की इत्तेफ़ाकिया मौत'। रवींद्र भवन के शानदार एयरकंडिशंड हाल में नाटक होना था।
मैं प्रेस गैलरी में बैठकर नाटक देखने और उसका कवरेज करने के लिए जोश से लबालब भर उठा। अपनी एटलस रिबेल साइकिल ली और नाटक शुरू होने से तकरीबन आधा घंटा पहले ही रवींद्र भवन जा पहुंचा। वहां शान से इनविटेशन कार्ड दिखाकर प्रेस गैलरी में जा बैठा। नाटक शुरू हुआ और ज़्यादातर हिस्सा मेरे सिर के ऊपर से गुज़रने लगा। नाटक की कहानी ठीक क्या थी, मुझे नहीं पता। लेकिन जैसा कि नाम से पता चलता था, नाटक किसी अराजकतावादी शख्स की मौत को लेकर रहा होगा। बहरहाल, रिपोर्टिंग तो करनी थी। इसलिए नाटक बीच में छोड़कर नहीं लौट सकता था। सो, तकरीबन आधे घंटे तक चुपचाप सबकुछ देखता रहा।
नाटक लगातार आगे बढ़ रहा था। तभी अचानक हॉल के पिछले हिस्से से एक महिला "बंद करो ये नाटक... ये सब क्या हो रहा है... जो मन में आता है, बोलने लगते हो..." कहती हुई स्टेज की ओर दौड़ी। महिला की इस हरकत से पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। आयोजकों ने आनन-फानन में मंचन रोक दिया और कुछ देर के लिए पर्दा भी गिरा दिया गया। बस, फिर क्या था? मेरे अंदर का रिपोर्टर जाग उठा। मैंने अपने अगल-बगल देखा दूसरे पत्रकार भी इस 'नए नाटक' को लेकर आपस में बातें करने लगे। मुझे नाटक बीच में छोड़कर दफ़्तर पहुंचने का यही सबसे सही वक़्त लगा। तुरंत हॉल से बाहर निकला और अपनी साइकिल उठाकर दफ़्तर की ओर भागा।
उन दिनों मेरे एक सीनियर रतन जोशी अख़बार में कला-संस्कृति का पन्ना संभालते थे। हांफते-हांफते मैंने उन्हें पूरी कहानी सुनाई और बताया कि किस तरह नाटक के बीच में ही बवाल हो गया और आयोजकों को मंचन रोकना पड़ा। मेरे जोश को देखते हुए उन्होंने तुरंत मुझे सबकुछ लिख डालने की हिदायत दी। बस, मैंने भी पूरे लच्छेदार तरीके से जो कुछ देखा, लिख डाला। फिर अंत में रिपोर्ट के ऊपर अपना नाम भी मोटे अक्षरों में लिखा, ताकि अगले दिन सुबह के अख़बार में बाइलाइन रिपोर्ट छपी हो।
अगले दिन उठकर मैं सबसे पहले बस स्टैंड के न्यूज़पेपर स्टॉल पर पहुंचा। ये देखने के लिए मेरी बाइलाइन रिपोर्ट अख़बार में कैसे और कहां छपी है? लेकिन जब काफ़ी ढूंढ़ने के बाद भी मुझे अपनी बाइलाइन नहीं दिखी, तो मैंने ख़बरों की हैडिंग पढ़नी शुरू की। तब अंतिम पन्ने पर मुझे अपनी ख़बर दिखाई पड़ी। तीन कॉलम की ख़बर। लेकिन मेरा नाम नहीं छपा था, लिहाज़ा मैं बहुत निराश हुआ। मन ही मन रतन जी को भी कोसने लगा। लेकिन अभी चंद घंटे गुज़रे थे कि निलय सेनगुप्ता ने मुझे बुलवा भेजा। जब उनके पास पहुंचा, तो वे लाल-पीले हो रहे थे। उन्होंने मुझे बड़ी लानत दी और कहा कि अब तुम कभी जर्नलिस्ट नहीं बन सकते। उनका रौद्र रूप देखकर मुझे उनसे इसकी वजह पूछने की भी हिम्मत नहीं हुई। चुपचाप सिर झुकाए खड़ा रहा। हारकर उन्होंने ही मुझे बताया कि मेरी ग़लती क्या है। निलय दा ने कहा, 'कल रवींद्र भवन में तुमने जिसे हंगामा समझा, वो दरअसल नाटक का ही हिस्सा था। नाटक बीच में रुकवाई नहीं गई, कलाकारों ने ही जानबूझ कर रोकी थी।' मुझे बाकी बात समझने में देर नहीं हुई। ये भयानक ग़लती थी। निलय दा ने बताया कि किस तरह आज सुबह से ही अख़बार के दफ़्तर में फ़ोन आ रहे हैं और सारे लोग मज़ाक बना रहे हैं।
मैं बेहद शर्मिंदा था... और ये भी सोच रहा था कि अगर रतन जी ने उस रोज़ ग़लती से भी ख़बर के साथ मेरा नाम छाप दिया होता, तो मेरी क्या हालत होती...? ख़ैर, एक अच्छी बात ये थी कि बाद में ख़ुद निलय दा, रतन जी और दूसरे कई सीनियरों ने इतना होने के बावजूद मेरी ख़ूब हौसला अफ़ज़ायी की।
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