
तालिबान ने हाल ही में अपने दबदबे वाले इलाकों में कई गैरइंसानी फ़रमान जारी किए हैं। इनमें लड़कियों के नेल पॉलिश लगाने पर ऊंगलियां काट लेने, बिना बुर्के के बाहर निकलने के पर संगसार कर मौत के घाट उतारने और ज़ोर से हंसने पर सरेआम सज़ा देने की बात कही गई है। वैसे तालिबान इससे दो कदम आगे बढ़ कर एक ऐसे टीचर की जान भी ले चुका है, जिसने उनके छोटे पायजामे पहनने के फ़रमान की अनसुनी कर दी थी... जब-जब ऐसी ख़बरें टीवी पर देखता हूं या अख़बारों में पढ़ता हूं, तो मन कड़वाहट से भर उठता है। सोचता हूं कि कोई इंसान भला किसी दूसरे इंसान की ज़िंदगी के कायदे-कानून कैसे तय कर सकता है? वो भी गैरइंसानी तरीके से! वो कैसा समाज है, जहां मज़हब के नाम पर किसी के हंसने पर भी रोक लगा दी जाए और हंसते ही जान चली जाए! जितनी बार सोचता हूं, हैरान हो जाता हूं।
लेकिन उससे भी ज़्यादा हैरानी तब होती है, जब श्रीराम सेना को मैंगलोर के पब में गुंडागर्दी करते देखता हूं। टीवी के फुटेज बताते हैं कि श्रीराम सेना के गुंडों ने पब में धावा बोलकर लड़के-लड़कियों को बेतरह पीटा और कहा कि जब-जब हिंदुस्तानी संस्कृति पर कोई हमला होगा, वे ऐसे ही कार्रवाई करेंगे। तालिबान की हालत पर तो सिर्फ़ अफ़सोस ही हो रहा था, लेकिन मंगलूर की हालत देख कर ख़ून खौल उठा। फर्ज़ कीजिए आप अपने दोस्तों के साथ कहीं इत्मीनान से बैठे चाय-कॉफी पी रहे हों या फिर शराब से ही हलक तर कर रहे हों, समाज के ऐसे पहरेदार वहां पहुंचकर बिना किसी बात के आपको बुरी तरह पीटने लगें, तो कैसा लगेगा? या फिर पिटती हुई लड़कियों में कोई आपकी बहन या बेटी हो, तो फिर तकलीफ़ कितनी बढ़ जाएगी? तस्वीरों में पिटते नौजवानों को देख कर लगा जैसे श्रीराम सेना के हाथों मैं भी घिर गया हूं और समाज के ऐसे ही ठेकेदार मुझे भी बुरी तरह पीट रहे हैं। गुस्से के मारे गर्मी लगने लगी और लगा ऐसे ठेकेदारों के साथ मैं भी कुछ वैसा ही करूं, जैसा उन्होंने बेगुनाहों के साथ किया है। लेकिन अफ़सोस... क़ानून पर भरोसा करनेवाले ऐसा कुछ नहीं कर सकते।
ऐसा नहीं है कि सभ्यता संस्कृति के नाम पर ऐसा पहली बार हुआ है। इस बार तो ये फुटेज टीवी पर दिखा, सालों-साल रिपोर्टिंग के दौरान कभी वैलेंटाइन डे के मौके पर, तो कभी किसी और दिन, ऐसा मंज़र अपनी आंखों से लाइव देखा है, लेकिन ऐसे गुंडों को सिर्फ़ रोकने की कोशिश करने या फिर उन्हें अच्छा-बुरा समझाने के और कुछ भी नहीं कर सका हूं। अक्सर अपनी इस लाचारगी पर बड़ी कोफ़्त होती है। अपनी हैसियत के छुटपन का अहसास भी सताने लगता है। लेकिन... बस यहीं तक। इसके आगे और कुछ नहीं होता। या फिर यूं कहिए कि हो नहीं सकता...
मुझे यकीन है कि ऐसी गुंडागर्दी देख कर आपकी हालत भी ऐसी ही होती होगी। ज़रूरत है कि हम घर के तालिबान से सबसे पहले निबटें और हमारे चुने हुए नुमाइंदों पर क़ानून की हद में रहते हुए ऐसे गुंडों के साथ कुछ ऐसी सख्ती के लिए दबाव बनाएं कि फिर कोई गुंडा पैदा होने से पहले दस बार सोचे... एक बेहतर कल की उम्मीद के साथ...
(चित्र सौजन्य- www.daijiworld.com)