क्या साबुन जैसी किसी चीज़ से इमोशनल अटैचमैंट हो सकता है? सवाल अजीब है। लेकिन इसी अजीबियत में मेरे इस पोस्ट की आत्मा छिपी है। मेरे पास एक साबुन की टिकिया है, विप्रो शिकाकाई। हर दूसरे दिन उसे बालों में लगाता हूं और कुछ ऐसे धो-पोंछ कर साबुनदानी में रख देता हूं जैसे साबुन न हो सोने की टिकिया हो। हर बार ये साबुन अपने सिर में लगाते हुए इमोशनल हो जाता हूं और ये दुआ करता हूं कि ये साबुन कम से कम घिसे। इस टिकिया के हाथ लगने से पहले मैं हमेशा ही अपने बालों में शैंपू लगाता था। लेकिन विप्रो शिकाकाई की इस लाल टिकिया के मिलने के बाद से मैंने कोई शैंपू छुआ ही नहीं। पता नहीं ये मेरे लगातार कम होते बालों के लिए कितना फ़ायदेमंद है, लेकिन फिर भी ये टिकिया मुझे बाथरूम में घुसते ही भावुक बना देती है।
मैं काम-काज के सिलसिले में सालों-साल अपने मां-बाबा से दूर रहा हूं। लेकिन कुछ रोज पहले दोनों दिल्ली आए थे। मेरे साथ तकरीबन दो महीने रह कर दोनों जमशेदपुर लौट गए। जाते-जाते मेरी मां हमेशा की तरह ख़ूब रोईं... मैंने ये साबुन की टिकिया उनसे मांग कर पहले ही अपने पास रख ली थी। मेरी मां एक ख़ालिस हिंदुस्तानी घरेलू महिला हैं और चूल्हे-चौके के बाहर की दुनिया नहीं ज़्यादा जानती। शायद इसलिए आज भी शैंपू, कंडिशनर, वाइटालाइज़र और नरिसमैंट लौशन की जगह अपने बाल साबुन से धोती हैं... इस बार भी वो अपने साथ साबुन की यही एक टिकिया लेकर आई थीं। लेकिन उनकी हर चीज़ पर अपना हक़ मानते हुए मैंने उनसे ये टिकिया मांग ली। अब मां जमशेदपुर लौट गई हैं। लेकिन ये छोटी सी टिकिया मुझे बार-बार मां की याद दिलाती है, इमोशनल बनाती है। सोचता हूं कि अब कभी शैंपू नहीं लगाऊंगा... जब ये टिकिया ख़त्म हो जाएगी, तब एक और नई विप्रो शिकाकाई ले आऊंगा... लेकिन फिर ये भी सोचता हूं कि क्या उससे मां की खुशबू आएगी???
Thursday, 13 August 2009
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8 comments:
मनोवैज्ञानिक महोदय इस प्रकार के जुड़ाव को न जाने कौन सा नाम दे देंगे,
पर यह जुड़ाव अस्वाभाविक नहीं है । बेहतरीन तरीके से रखी गयी एक ईमानदारी स्वीकारोक्ति !
बेशक आपकी नई टिकिया से मां की खुशबू ना आये लेकिन उनकी इस पुरानी टिकिया से आपका जुड़ाव ये ज़रूर दर्शाता है आजकी दिखावे और आपाधापी की दुनिया में आपके भीतर अभी भी कुछ भावनात्मक विरासत है जो दूसरों की नज़र में एक सामान्य, साबुन की टिक्की से भी आपको इमोशनली अटैच्ड़ किये हुये है।
जियो दोस्त।
जी हाँ इमोशनल अटैचमेंट किसी भी व्यक्ति -- या फिर किसी भी वस्तु से हो सकती है.
बहुत बढिया आलेख
आप के केश बड़े काले हैं। इन्हें साबुन से न छुआएँ, सुफेद हो जाएँगे।
;) मसखरी थी।
माताएँ होती ही ऐसी हैं। मिलने के समय फूल जाती हैं और आप फुला जाते हैं। विछोह होते आँसू रोक आप की जेब में शमी का पत्ता रखती हैं। यात्रा में आप की रक्षा करेगा । उस दिन रोती नहीं - रोना अशुभ होता है।
अगले दिन खूब रोती हैं। आप भी सेंटी हो जाते हैं और दुनिया चलती रहती है।
आप की पोस्ट से वाशिंग मशीन में धुलने के बाद भी मेरी जेब से निकलते शमी के पत्ते याद आ गए ! आप ने एक लेख का सामान दे दिया। धन्यवाद
।
अरे जनाब इस टिकिया से इतनी भी मुहब्बत मत कीजिये कहीं ऐसा न हो कि आप इसे मोह में खर्चें नहीं और लोग आपके बालों की खुशबू से बेहोश होने लगें.......
बहुत खूब...सुप्रतिम भाई... साबुन को किफायत से इस्तेमाल करते रहिए...
सुप्रतिम जी,
जब-जब घर से वापस दिल्ली आने लगता हूं तो मां बैग में कुछ न कुछ डालने लगती हैं। कभी अचार, कभी भी तो कभी कुछ। लेकिन मैं कभी कुछ नहीं लाता।
ऐसा इसलिए क्योंकि एक बार मैं आचार ले आया था। अब मैं उस आचार को बहुत डरते-डरते खाता था कि कहीं खत्म न हो जाए। ठीक उसी तरह पापा जब कभी मेरे कोई काग़ज़ात पापा ने भेजे हैं तो मैंने उनके एनवेलप्स को संभाल कर रखा है। क्योंकि उसमें पापा ने मेरा एड्रेस लिखा है अपने पेन से।
ऐसी और कई बाते हैं।
ये बेहत भावनात्मक पहलू होता है। मैं इस बात को अच्छी तरह समझ सकता हूं।
kya bat hai dost. padhte hue maa ki yad aa gayi. kash maa hamesa hamare sath rehti. beta kitna bhi samajhdar ho jaye maa har bat use aaise samjhati hai jaise wo ab bhi chota hi ho. chota bankar hi is feeling ko enjoy kiya ja sakta hai. bahut badhiya.
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